ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) से अपनी निष्ठा के चलते मंत्री पद छोड़ने वाले नेताओं की राह भारतीय जनता पार्टी में आसान नजर नहीं आ रही है. बीजेपी में शामिल होने के लिए सभी 22 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
Source: News18 Madhya Pradesh
Last updated on: June 2, 2020, 11:11 AM IST
परंपरागत चेहरों को बाहर करने की चुनौती
भारतीय जनता पार्टी के दर्जन भर से अधिक विधायक ऐसे हैं, जिनकी राजनीति में वरिष्ठता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ही समकक्ष हैं. पंद्रह साल की सरकार में लगातार मंत्री भी रहे हैं. प्रतिपक्ष के नेता रहे गोपाल भार्गव को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है. शिवराज सिंह चौहान ने 21 अप्रैल को जिन पांच विधायकों को मंत्री बनाया था उनमें दो चेहरे सिंधिया समर्थकों के थे. ये तुलसी सिलावट एवं गोविंद राजपूत हैं. भाजपा कोटे से सिर्फ तीन चेहरों को जगह दी गई थी. नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल और मीना सिंह. नरोत्तम मिश्रा और कमल पटेल दोनों ही केन्द्रीय नेतृत्व की पंसद पर मंत्री बने हैं. शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार अपनी पसंद नापसंद के आधार पर करना चाहते हैं. लेकिन, केन्द्रीय नेतृत्व राजनीतिक संतुलन को साधकर आगे बढ़ाना चाहता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा का भी कोई संदेश केन्द्रीय नेतृत्व नहीं देना चाहता.
22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ी थीदरअसल, सिंधिया के साथ जिन 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ी थी, उनमें छह कमलनाथ मंत्रिमंडल में मंत्री थे. भाजपा की सरकार के गठन के बाद शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में छह मंत्री सिंधिया समर्थक रखने की कवायद के कारण भाजपा के आतंरिक समीकरण गड़बड़ा रहे हैं. सबसे ज्यादा खींचतान बुंदेलखंड और ग्वालियर -चंबल में चल रही है. बुंदेलखंड क्षेत्र से भाजपा के दो बड़े चेहरे गोपाल भार्गव एवं भूपेन्द्र सिंह हैं. दोनों ही सागर जिले की विधानसभा सीटों से चुनकर आते हैं.
वहीं, सिंधिया समर्थक गोविंद राजपूत भी सागर जिले के ही हैं. राजपूत के मंत्री बनाए जाने के बाद सागर जिले से एक और विधायक को मंत्री बनाया जा सकता है. शिवराज सिंह चौहान अपने समर्थक भूपेन्द्र सिंह को मंत्रिमंडल में लेना चाहते हैं. केन्द्रीय नेतृत्व गोपाल भार्गव की अनदेखी नहीं करना चाहता. कमलनाथ सरकार को गिराए जाने की रणनीति में भूपेन्द्र सिंह की भूमिका को भी कोई नकार नहीं पा रहा. मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता जेपी धनोपिया का मानना है कि भाजपा में स्थिति बगाबत की है, इस कारण मंत्रिमंडल के गठन को टाला जा रहा है.
सिंधिया समर्थकों की राह में हैं कई रोड़ेज्योतिरादित्य सिंधिया से अपनी निष्ठा के चलते मंत्री पद छोड़ने वाले नेताओं की राह भारतीय जनता पार्टी में आसान नजर नहीं आ रही है. भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के लिए सभी 22 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. ये सभी वर्तमान में विधायक नहीं है. मंत्री बनाए गए तुलसी सिलावट और गोविदं राजपूत भी वर्तमान में विधायक नहीं है. भारतीय जनता पार्टी में एक धड़ा इस बात पर जोर दे रहा है कि सिंधिया समर्थकों को विधायक निर्वाचित होने के बाद ही मंत्री बनाया जाना चाहिए.
ज्यादा समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह मिले
बताया जाता है कि सिंधिया चाहते हैं कि उनके ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह मिले. तर्क यह दिया जा रहा है कि मंत्री होने से उपचुनाव जीतना आसान हो जाएगा. जोर इस बात पर भी है कि अनुसूचित जाति वर्ग के ज्यादा से ज्यादा लोगों को मंत्री बनाया जाना चाहिए. सबसे ज्यादा विधानसभा के उपचुनाव इस वर्ग के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों पर हैं. ऐदल सिंह कंसाना और बिसाहूलाल सिंह को लेकर भी भाजपा में असमंजस दिखाई दे रहा है. ये दोनों सिंधिया समर्थक नहीं हैं. लेकिन, कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं. मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं कि मुख्यमंत्री सही समय पर सही लोगों को मंत्रिमंडल में जगह देंगे. अग्रवाल कहते हैं समय जल्द आने वाला है. देश अनलॉक होना शुरू हुआ है.
सिंधिया -चौहान मुलाकात का इंतजार
शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार भी भोपाल नहीं आए हैं. लॉकडाउन के कारण शिवराज सिंह चौहान का भी दिल्ली जाना नहीं हो सका है. चौहान आज-कल में दिल्ली जा सकते हैं. यह चर्चा पिछनले एक सप्ताह से चल रही है. प्रदेश भाजपा में भी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है. इंतजार केन्द्रीय नेतृत्व के फैसले का है. सोमवार को अनलॉक शुरू होने के बाद मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि जब वे दिल्ली जाएंगे,पता चल जाएगा. माना यह जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया जब तक आमने-सामने नहीं बैठेंगे,मंत्रिमंडल के विस्तार का मामला लटका रहेगा. सिंधिया को इंतजार राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया के आगे बढ़ने का है. लॉकडाउन के कारण चुनाव आयोग ने राज्यसभा के चुनाव के लिए वोटिंग को टाल दिया था.
विधानसभा अध्यक्ष को लेकर भी फंसा है पेंच
विधानसभा के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हाथ से सत्ता चले जाने से शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक स्थिति में फर्क आया है. शिवराज सिंह चौहान के तेरह साल के मुख्यमंत्रित्व काल में जो नेता अलग-थलग कर दिए गए थे,अब वे बदली हुई राजनीतिक परिस्थतियों में लामबंद होते दिखाई दे रहे हैं. विंध्य अंचल में शिवराज सिंह चौहान के करीबी राजेन्द्र शुक्ला को मंत्री बनाए जाने का विरोध हो रहा है. अंचल से केदार शुक्ला ने अपनी दावेदारी ठोक दी है. केदार शुक्ला का नाम विधानसभा अध्यक्ष के लिए भी चर्चा में है. इनके अलावा डॉ.सीताशरण शर्मा का नाम भी विधानसभा अध्यक्ष के लिए चर्चा में है. डॉ.शर्मा पिछले भाजपा शासनकाल में भी विधानसभा अध्यक्ष थे. राज्य में कांग्रेस की सरकार गिर जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति और उपाध्यक्ष हिना कांवरे ने पद से इस्तीफा दे दिया था. राज्यपाल ने जगदीश देवड़ा को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया है. देवड़ा भी मंत्री बनने की कतार में हैं.
डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.
First published: June 2, 2020, 10:02 AM IST


