Crores of land documents are dilapidated or records are missing … full suspense! | करोड़ों की जमीन के दस्तावेज जीर्ण-शीर्ण या फिर रिकॉर्ड ही गायब…फुल सस्पेंस.!

Crores of land documents are dilapidated or records are missing … full suspense! | करोड़ों की जमीन के दस्तावेज जीर्ण-शीर्ण या फिर रिकॉर्ड ही गायब…फुल सस्पेंस.!


जबलपुर16 मिनट पहले

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  • मेडिकल अस्पताल के पीछे गढ़ा पुरवा के खसरों में सन् 1954 से 58 के बीच हुई हेराफेरी, जिम्मेदारों ने साध रखी है चुप्पी

खसरा नंबर-662 की जमीन में हुई हेराफेरी की गहराई में राजस्व अधिकारी ऐसे डूबे कि अभी तक उबर नहीं पाए। जबकि कलेक्ट्रेट के सूत्र बताते हैं कि जिस खसरे का रिकॉर्ड ही गायब है और उस रिकार्ड को जीर्ण-शीर्ण बताकर कार्रवाई आगे बढ़ा दी गई है, उस जमीन की वास्तविकता उजागर ही नहीं हो सकती। क्योंकि जो जमीन सन् 1909 से 1953 तक तालाब मद की थी वो सन् 1954 से 1958 के बीच अचानक निजी नाम से कैसे हो गई? इस दिशा में तो जाँच ही नहीं हुई। पूरे 5 साल का खसरा जीर्ण-शीर्ण कैसे हो गया? जब पटवारी-आरआई जमीन की उपज, पड़त, खेती के प्रकार आदि का, हर साल रिकॉर्ड संधारण करते हैं तो क्या खसरा नंबर-662 की जमीन के रिकॉर्ड का संधारण नहीं हुआ होगा? और यदि हुआ है तो पटवारी रिकॉर्ड कहाँ गायब हो गया? इस बात की जाँच आज तक नहीं हुई। जबकि इन्हीं 5 सालों के रिकॉर्ड में खेल होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। सूत्र बताते हैं कि जमीन की हेराफेरी के चक्कर में रिकॉर्ड गायब करा दिया गया है। क्योंकि सन् 1954 से 1958 के बीच का एक साथ पूरा रिकॉर्ड जीर्ण-शीर्ण नहीं हो सकता! यदि हुआ भी है तो पुराना पटवारी रिकॉर्ड निकलवाया जा सकता है, उसके आधार पर जाँच हो सकती है।

आवेदन पत्र बन जाता है आदेश करने का आधार
कलेक्ट्रेट के गलियारे में इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि रिकॉर्ड रूम में यदि बाबू-चपरासी से साँठगाँठ हो जाए तो सब कुछ संभव है। जिसके आधार पर रिकॉर्ड में हेराफेरी आसानी से की जा सकती है। इसके लिए रिकॉर्ड रूम में पदस्थ कर्मचारियों को साधने की जरूरत पड़ती है। रिकॉर्ड रूम के बाबू-चपरासी रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और कराने में माहिर हैं। अगर यहाँ के कर्मचारी अपनी पर आ जाएँ तो आवेदन पत्र को ही रिकॉर्ड के रूप में वे तब्दील कर देते हैं। जिस दस्तावेज पर पर्दा डालना हो, उस आवेदन पत्र को ही रिकॉर्ड के रूप में तब्दील करा लिया जाता है और उस आवेदन पत्र में रिकॉर्ड जीर्ण-शीर्ण लिखवा लिया जाता है। उस आवेदन पत्र को रिकॉर्ड बाँटने वाले बाबू के पास पहुँचा दिया जाता है। आवेदन पत्र को सर्टिफाइड कॉपी के रूप में देने के लिए राजस्व अधिकारी आवेदन पत्र में सील, हस्ताक्षर कर देते हैं और उस आवेदन पत्र को दस्तावेज के रूप में बतौर तहसीलदार, पटवारी, आरआई के समक्ष पेश किया जा सकता है। उसी आवेदन पत्र को दस्तावेज मानते हुए जमीन का नामांतरण, बँटवारे का आदेश तक हो जाता है। जानकारों के मुताबिक खसरा नंबर- 662 को निपटाने में कुछ ऐसा ही खेल खेला गया है।

रिकॉर्ड किस कारण जीर्ण-शीर्ण हुए इस दिशा में नहीं हुई जाँच
तालाब, ग्रीन बेल्ट की जमीन बताकर एक शिकायती पत्र कलेक्टर को भी भेजा गया। जिसके आधार पर तत्कालीन कलेक्टर द्वारा खसरा नंबर-662 के सन् 1909 से अभी तक के रिकॉर्ड की जाँच पड़ताल कराई गई। जिसमें पाया गया कि सन् 1953-54 से लेकर 1958-59 तक का रिकॉर्ड जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। जाँच अधिकारियों ने उस रिकॉर्ड को जीर्ण-शीर्ण मान भी लिया और आगे सन् 1959-60 के रिकॉर्ड को आधार मानते हुए आगे की जाँच शुरू कर दी। जबकि इससे पहले ही सन् 1953 से लेकर 1958 के बीच खसरा नंबर-662 में घालमेल हो चुका था। जाँच टीम यदि रिकॉर्ड के जीर्ण-शीर्ण होने की जाँच कर लेती, तो इतनी लंबी मशक्कत करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। दूध का दूध और पानी का पानी उसी समय हो गया होता, जिस दौरान रिकॉर्ड जीर्ण-शीर्ण कराया या गायब किया गया था।

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