नरसिंहगढ़7 घंटे पहले
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- पांडव चौराहे की चिंतामन गली में स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर में पारंपरिक भरोड़िया पर्व अब भी मनाया जाता है
क्षारबाग तिराहा पर स्थित शीतला माता के मंदिर से शहर के सभी लोग परिचित हैं लेकिन एक और शीतला मंदिर है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। यह बहुत पुराना है और पिछले दिनों ही इसका जीर्णोद्धार हुआ है। पांडव चौराहे की चिंतामन गली में स्थित शीतला माता के मंदिर में सन 2010 तक इमली के पेड़ के चारों ओर देवी प्रतिमाएं स्थापित थीं। उसी दौरान तत्कालीन विधायक मोहन शर्मा से मिली 50 हजार रुपए की विधायक निधि और अन्य श्रद्धालुओं के आर्थिक अंशदान से मंदिर को विकसित किया गया। मंदिर में पुराने समय से ही शीतला सप्तमी और नवरात्र के त्योहार मनाए जाते रहे हैं।
64 योगिनी के दिव्य प्रतीक स्थापित हैं: मंदिर से जुड़े शासकीय कन्या उमावि के खेल प्रशिक्षक राधेश्याम भिलाला ने बताया कि जब मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा था तब इमली के पेड़ के चारों ओर की प्रतिमाओं की गिनती की गई। जो संख्या में 64 निकलीं। इनके विषय में दिवंगत प्राचार्य आरसी त्रिपाठी ने बताया था कि यह उज्जैन के 64 योगिनी मंदिर की प्रतिकृति हैं। इसके बाद मंदिर का धार्मिक महत्व और बढ़ गया। भिलाला ने यह भी बताया कि आसपास के परिवारों में रियासत काल से ही यह परंपरा चली आ रही है कि अष्टमी को कुलदेवी की पूजा के बाद सभी अपने-अपने घरों से देवी को प्रणाम करके एक नारियल लाकर दूसरे दिन नवमी को शीतला माता मंदिर में अर्पित करते हैं। यह अपने परिवार की सुख शांति के लिए मांगी जाने वाली प्रार्थना का प्रतीक होता है।
महाराज विक्रम सिंह की हुई थी माता पूजन : मंदिर के जीर्णोद्धार में 50 हजार रुपए का अंशदान देने वाले रिटायर्ड शासकीय कर्मचारी छोटेलाल मेवाड़े ने बताया कि उनके पिता दिवंगत मेहताब मेवाड़े बताते थे कि मंदिर में नरसिंहगढ़ रियासत के शासक महाराज विक्रम सिंह के विवाह की माता पूजन हुई थी। महाराज विक्रम सिंह और मेहताब मेवाड़े की माता पूजन एक ही दिन हुई थी।
भरोड़िया की पूजा मंदिर की विशेष परंपरा
हेमराज मेवाड़े ने बताया कि हर साल होलिका दहन के 15 दिन बाद सामूहिक रूप से महिला पुरुष श्रद्धालु मंदिर में भरोड़िया की पूजा करते हैं। इसमें भांग, दूध, चरणामृत और भुने हुए चने का प्रसाद चढ़ाया जाता है। पूजा के साथ ही होली की अग्नि को ठंडा किया जाता है। यह स्थानीय परंपरा होली की नहान के समानांतर चलने वाली परंपरा है।