रोचक जानकारी: बच्चों की तरह चंदेरी साड़ियों को भी नजर से बचाने के लिए लगाते हैं काला टीका

रोचक जानकारी: बच्चों की तरह चंदेरी साड़ियों को भी नजर से बचाने के लिए लगाते हैं काला टीका


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  • Chanderi Saree; Interesting Facts About Chanderi Saree (चंदेरी साड़ी) Of Madhya Pradesh

भोपाल13 मिनट पहले

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  • सालों से चली आ रही है यह परंपरा
  • हर चंदेरी साड़ी की अलग कहानी, जो एक जैसा है वह है काला टीका

राजेश गाबा।

बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए काजल का टीका लगाने की परंपरा सदियों पुरानी है। दूल्हे को नजर न लगे, इसलिए उसे भी काला टीका लगाया जाता है पर क्या आप जानते हैं कि काजल का ऐसा ही टीका लगता है चंदेरी साड़ियों पर भी। जी हां, ऐसा ही है। चंदेरी साड़ियों में हर एक मीटर की दूरी पर काला टीका लगाते हैं कारीगर।

गौहर महल में चल रहे दीपोत्सव मेले में यह जानकारी चंदेरी से आए कलाकार मो. नफीस ने दी।

मो. नफीस ने बताया कि मैं चंदेरी से हूं। मेरी तीन पीढ़ियों से चंदेरी की साड़ियां बनाई जा रही हैं। चंदेरी साड़ी पर काला टीका लगाने की एक खास परम्परा रही है। जैसे ही कोई साड़ी बनकर तैयार होती थी तो उसे नजर से बचाने के लिए यह काला टीका लगाया जाता था। पहले तो यह टीका मोटा और दिखता हुआ होता था। लेकिन आजकल इसकी साइज छोटी हो गई है। इसकी वजह है कि कस्टमर को लगता है साड़ी पर दाग लगा हुआ है, हालांकि इसे छोटा करते हुए आज भी काला टीका लगाने की परम्परा अनवरत जारी है।

चंदेरी साड़ियों के कद्रदान दुनिया भर में हैं। फिल्म पाकीजा में इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा गीत में मीना कुमारी ने चंदेरी दुपट्टा ओढ़ा था। करीना कपूर खान भी चंदेरी साड़ियों की मुरीद है। काले रंग की साड़ी उनकी पहली पसंद थीए इसलिए उसका नाम करीना साड़ी रख दिया। सुई-धागा फिल्म की शूटिंग के लिए अनुष्का शर्मा महीनाभर चंदेरी गांव में रहीं और अलग-अलग कारीगरों से साड़ियां खरीदी थीं।

इतिहास में चंदेरी के बुनकरों का उल्लेख 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आगमन के समय मिलता है। बताया जाता है कि करीब 20 हजार बुनकर मौलाना मजिबुद्दीन उलुफ के अनुयायियों के रूप में बंगाल के लखनोती (ढाका) से विस्थापित होकर चंदेरी आ गए थे। पहले जापानी सिल्क से साड़ियां बनती थी, 1940 में कारीगरों ने नई किस्म ईजाद की। आंध्रप्रदेश में मिलने वाले कोलिकंडा पेड़ की जड़ से तैयार धागों से साड़ियां बनाई जाने लगी। चंदेरी साड़ियों में वनस्पति रंगों का प्रयोग होता है। हर्रे-बहर्रे, अनार के छिलके, सिंघाड़ा की बेल, बबूल की छाल, फिटकरी व कशिश से बने रंग प्रयोग किए जाते हैं।

दो चश्मी चंदेरी का नाम जितना रोचक है। उससे ज्यादा रोचक इसकी कहानी है। इस साड़ी का नाम दो चश्मी उस समय पड़ा। जब सालों पहले लंदन की क्वीन एलिजाबेथ ने इसे देखा। लंदन में एग्जीबिशन में दौरान जब एलिजाबेथ ने साड़ी के बारे में जानना चाहा तो एग्जीबिटर ने कहा कि इस साड़ी को दो चश्मे से देखा जा सकता है। एलिजाबेथ को ये पैटर्न बहुत पसंद आया और इसके बाद साड़ी का नाम ही दो चश्मी पड़ गया। इसमें एक ही बूटे पर दोनों तरफ अलग-अलग रंग होते हैं। इस साड़ी की कीमत करीब 40 हजार है।



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