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उज्जैन2 घंटे पहले
दंगल में जोर आजमाइश करते मड़िया और भूरा।
- प्रतिबंध के बावजूद उज्जैन में जारी है पाड़ों की लड़ाई
- दंगल के आयोजकाें का तर्क- वर्षों पुरानी परंपरा निभाने की है रस्म
उज्जैन में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद रोज पाड़ों (भैसों) की लड़ाई जारी है। आयोजक कहते हैं कि यह वर्षों पुरानी रस्म है। चाहे चोरी छिपे करनी पड़े चाहे खुलेआम, जिसे हर हाल में निभाना ही है। पाड़ों की लड़ाई देखने के लिए हजारों की संख्या में ग्रामीण जुटते हैं। ऐसी ही एक लड़ाई सोमवार को देवास रोड स्थित खजूरिया रेवारी में हुई, जिसमें 10 जोड़ी पाड़ों ने आपस में जोर आजमाइश की। इसमें न कोई जीता और न कोई हारा। इसे देखने के लिए हजाराें की संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।
पाड़ों के दंगल के आयोजक शैलू यादव ने बताया कि वर्षों पहले जब पशु पालकों के पास मनोरंजन के साधन नहीं होते थे, तब इलाकेे में पहचान बनाने के लिए पाड़ों को लड़ाया जाता था। इसमें आस पास के कई गांवों के पशु पालक अपने पाड़े लाते थे, जिसका पाड़ा जीतता था, उसका क्षेत्र में बड़े पशु पालकों में नाम शुमार होता था। यह परंपरा आज भी कायम है। मजे की बात यह है कि पशु पालक साल भर से पाड़ों को अच्छी खुराक खिलाकर दंगल के लिए तैयार करते हैं। पाड़ों का नाम भी रखा जाता है। लड़ाई 10-15 मिनट की होती है। जीत-हार का नतीजा पाड़ों के मूत्राशय को देखकर तय होता है। जिस पाड़े का मूत्र लड़ाई के समय गिरना बंद हो जाता है, उसे हारा हुआ मान लिया जाता है।
पशु क्रूरता अधिनियम के तहत दर्ज होता है केस
भैसों को आपस में लड़ाना पशु क्रूरता के अंतर्गत आता है। पशु क्रूरता अधिनियम के तहत पाड़ों को लड़ाने वालों के खिलाफ पुलिस केस दर्ज करती है। बावजूद चोरी छिपे पाड़ों का दंगल कराया जाता है। इस बावत एएसपी अमरेंद्र सिंह ने कहा कि पाड़ों की लड़ाई पर प्रतिबंध है। संज्ञान में लेकर आयोजकों पर प्रकरण दर्ज कराएंगे।