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भोपाल16 मिनट पहलेलेखक: राजेश गाबा
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गांधी मेडिकल कॉलेज के कमरा नंबर 28 में जहां लाशें रखी जा रही थीं। पूरा कमरा लाशों से भर गया।
- इस भयावह घटना के चमश्दीद और सीनियर फोटोग्राफर कमलेश जैमिनी ने दैनिक भास्कर के साथ इन तस्वीरों को साझा किया
दो-तीन दिसंबर 1984.. यह वह दिन है जिसके दर्द भोपाल आज भी नहीं भूल पाया है। जब सब सो रहे थे तभी भोपाल का एक बड़े इलाके में लाशों के ढेर बिछ गए। लाशें ढोने के लिए गाड़ियां छोटी पड़ गईं तो अस्पताल में कफन कम पड़ गए। यह हुआ था यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के प्लांट नंबर सी के टैंक नंबर 610 से रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के कारण।
पुराने लोग आज भी वह मंजर भूले नहीं हैं। जो इसकी पीड़ा झेल रहे हैं वे कई बार उस रात को याद कर सिहर उठते हैं। उस घटना को कमलेश जैमिनी ने अपने कैमरे में कैद किया जो फैक्टरी के ऑफिशियल फोटोग्राफर भी थे। 14 दिन तक वे घर नहीं गए थे। हमीदिया अस्पताल में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आने, मदर टेरेसा के आने, लाशों से भरे ट्रक, लाशों से पटे कमरा नंबर 28 को भी उन्होंने कैमरे में कैद किया था।
गैस त्रासदी की 36वीं बरसी पर कमलेश जैमिनी ने दैनिक भास्कर के साथ दुर्लभ तस्वीरों को शेयर किया। कमलेश जैमिनी की 20 तस्वीरों में महसूस करें उस स्याह रात की कहानी….

जेपीनगर में घर के बाहर सोता हुआ अखबार का हॉकर ब्रज नेमा उठ नहीं पाया। सोते-सोते जहरीली गैस ने उसे अपने आगोश में ले लिया। हादसे के बाद हुई जांच में ये बात सामने आई थी कि लोगों को मौत की नींद सुलाने में यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से निकली विषैली गैस को औसत तीन मिनट लगे थे।

हमीदिया अस्पताल में बेटे के इलाज के लिए गुहार लगाता रोता-बिलखता पिता।

गांधी मेडिकल कॉलेज पहली लाश जो एक लड़की की आई। इसके मुंह से निकल रहा था झाग।

गांधी मेडिकल कॉलेज की मर्चुरी के बाहर लाशें ज्यादा थी और कफन कम पड़ गए। कमरे लाशों से भर गए तो बाहर खुले मे रख दिया गया। गांधी मेडिकल कॉलेज में पहले दिन लाशों का ऐसा अंबार लगा कि पोस्टमार्टम के लिए हर तीन शव में से एक शव को चुनने के अलावा कोई चारा नहीं था।

जहरीली गैस ने बच्चों के फेफड़े से लेकर आंखों तक किया गहरा असर।

हमीदिया अस्पताल में आने लगे लाशों से भरे ट्रक। पोस्टमार्टम के लिए आते हुए। पुलिस वालों को भी नहीं समझ आ रहा था कि क्या करें।

जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने इंसान के साथ जानवरों को भी नहीं बख्शा। फैक्ट्री के बाहर बैठी बिल्ली जिसकी आंखों में गैस लगी। उसने फैक्ट्री की दीवार के बाहर बैठे-बैठे ही दम तोड़ दिया।

मरने वालाें में इंसानों के साथ जानवर भी थे। इंसानों की गिनती हुई, मातम हुआ आंसू बहे, जलसे हुए। यह सब बस इंसानों के लिए हुआ। जहरीली गैस लगते ही गाय की आंखों से खून निकल आया। उसने वहीं थोड़ी देर मे दम तोड़ दिया।

गांधी मेडिकल कॉलेज की मर्चुरी के बाहर लाशें ज्यादा थी और कफन कम पड़ गए। कमरे लाशों से भर गए तो बाहर खुले मे रख दिया गया। गांधी मेडिकल कॉलेज में पहले दिन लाशों का ऐसा अंबार लगा कि पोस्टमार्टम के लिए हर तीन शव में से एक शव को चुनने के अलावा कोई चारा नहीं था।

लगातार ट्रक भरकर लाशों के आने का सिलसिला हमीदिया अस्पताल में जारी रहा।मरने वालों की संख्या कितनी थी इसे लेकर आज तक सही आंकड़े सामने नहीं आ सके हैं।

एरियल व्यू यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का। पहले आसपास नहीं थी बसाहट।

जेपी नगर स्थित यूनियन कार्बाइड का एरियल व्यू फोटोग्राफ। जो कमलेश जैमिनी के पिता हरकृष्ण जैमिनी ने फ्लाइंग क्लब से पुष्पक विमान लेकर क्लिक किया था।

यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के प्लांट नंबर ‘सी’ के टैंक नंबर 610 में भरी थी। जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस। इसमें पानी भर गया। कैमिकल रिएक्शन से बने दबाव को टैंक सह नहीं पाया और वो खुल गया था।

गैस त्रासदी के बाद हर धर्म-संप्रदाय के लोग पीड़ितों की मदद के लिए चादर पर चंदा इकट्ठे करते हुए।

यूनियन कार्बाइड में बची गैस को खत्म करने के लिए आस्था अभियान शुरु। दहशतजदा लोगों का पलायन जारी हो गया। रेलगाड़ी से गांव की ओर भागते लोग।

त्रासदी के बाद अपना घर-बार सबकुछ छोड़कर बसों से गांव की ओर पलायन करने लगे।

दोबारा अफवाह उड़ी की गैस फिर निकली। लोग सिर पर सामान रखकर भागते हुए।

गैस त्रासदी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भोपाल आए। हमीदिया अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड गए। डॉक्टरों की टीम से बात की और हर संभव इलाज करने को कहा। साथ ही जनता से हौसला रखने को कहा था।

गैस त्रासदी के बाद मदर टेरेसा अपनी सहयोगी सिस्टर्स के साथ भोपाल आईं और हमीदिया अस्पताल में रोगियों की मदद के लिए जुट गईं।

गांधी मेडिकल कॉलेज की मर्चुरी के बाहर लाशें ज्यादा थी और कफन कम पड़ गए। कमरे लाशों से भर गए तो बाहर खुले मे रख दिया गया। गांधी मेडिकल कॉलेज में पहले दिन लाशों का ऐसा अंबार लगा कि पोस्टमार्टम के लिए हर तीन शव में से एक शव को चुनने के अलावा कोई चारा नहीं था।