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- Bhopal Gas Tragedy Day Story; Know What Had Happened On 1984? All You Need To Know
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भोपाल10 मिनट पहले
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रिटायर्ड आईपीएस अफसर स्वराजपुरी गैस त्रासदी के दौरान भोपाल में एसपी थे। उस काली रात की कहानी उन्होंने दैनिक भास्कर को बताई।
- सोल्जर था पीठ नहीं दिखाई, साहस के साथ किया हालात का मुकाबला
रात 12:30 के आसपास का समय था। पुलिस कंट्रोल रूम से मेरे लिए एक संदेश आरआई चौहान ने जारी किया। जिसमें बताया गया कि यूनियन कार्बाइड प्लांट से गैस का रिसाव हो गया है। संदेश देने वाले को चिंता हुई कि सैनिक ने साहब को बताया या नहीं? तो उन्होंने सब इंस्पेक्टर चाहतराम सिंह को मेरे चार इमली स्थित घर भेजा। उसने बताया कि भोपाल में गैस लीक हो गई है। पुराने शहर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया है। यह बताते-बताते चाहतराम को खूब खांसी आ रही थी। मुझे यह समझने में बिल्कुल भी देर लगी कि भोपाल में कोई बड़ी ट्रेजडी हो गई है। मैंने घर के अंदर झांक कर देखा कि बच्चे सो रहे हैं। मैने घर में किसी को नहीं जगाया। चेहरे पर रुमाल बांधा और जीप चलाकर सीधे पॉलिटेक्निक चौराहा पहुंचा। यहां तक आते-आते यह भी क्लियर हो गया था कि यूनियन कार्बाइड प्लांट में गैस लीक हुई है। कुछ लोग सड़क पर भागते हुए दिखे। मैंने वायरलेस पर सभी थानों को अलर्ट कर दिया था, जबकि कंट्रोल रूम का पूरा स्टाफ अपने बचाव के लिए वहां से निकल गया था।
ऐसी स्थिति में सड़कों पर जमा भीड़ को नियंत्रित करने की बड़ी चुनौती मेरे सामने आकर खड़ी हो गई थी। मैं बिना देर किए जीप को गैस प्लांट की तरफ ले गया। जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, लोग यूनियन कार्बाइड की तरफ से भागते हुए नए शहर की तरफ आ रहे थे। कुछ लोगों ने मुझे रोक कर वहां न जाने की सलाह दी। लेकिन मैं आगे बढ़ता गया। जैसे-तैसे मैं प्लांट के बिल्कुल करीब पहुंच गया। वहां का नजारा बहुत ही भयावह था। मेरी आंखें लाल हो चुकी थी। नाक से पानी बह रहा था।आवाज धीरे-धीरे खामोश होती जा रही थी। सामने कई लोगों को बेसुध पड़े देखा। मैं उनसे बात करने की कोशिश करने लगा, लेकिन न तो मेरी आवाज ठीक से निकल पा रही थी और वे भी कुछ बताने की स्थिति में थे। मैं जैसे-तैसे प्लांट के गेट तक पहुंच गया। यहां मैनेजर मुकुंद ने मुझे बताया कि गैस लीक हो गई है। मेरी हालत भी खराब होती जा रही थी। मैंने जीप के बोनट पर सिर रखकर अपने आप को संभाला। मैं वहां से जा भी नहीं सकता था। क्योंकि मैं सोल्जर था, पीठ कैसे दिखा देता? मैं पुलिस में आने से पहले आर्मी में था। मुझे नहीं पता था कि उस समय मैं दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेजडी का सामना कर रहा हूं। रात करीब 3 बजे तक पूरे शहर में अफरा-तफरी का माहौल हो चुका था। इस बीच मुझे खबर मिली कि लोग आक्रोशित हैं और प्लांट को जलाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। हालात ऐसे बन गए थे कि मैं अकेला पड़ गया था। उस समय जो बन पड़ा, किया। पुराने भोपाल के चौराहे पर खड़ा था। जीप में एक डंडा रखा था। डंडा हाथ में लिया और बीच सड़क पर खड़ा हो गया। पब्लिक को भगाया भी और समझाया भी। सुबह होते-होते तक लोगों को वापस घर लौटने के लिए पुलिस वाहनों से एनाउंसमेंट कराया। वहीं सुबह सात बजे के दौरान हमीदिया एवं जेपी अस्पताल में सैकड़ों लोग पहुंच गए। डाक्टर जो कर सकते थे, वे कर रहे थे। शहर और आसपास के थानों में पुलिस ने माेर्चा संभाल लिया था। घटना का ब्यौरा देने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सुबह 11 बजे प्रेस कान्फ्रेंस बुलाई थी। लेकिन इससे पहले यह संदेश आ गया कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी भोपाल आ रहे हैं। वे एयरपोर्ट से सीधे हमीदिया अस्पताल आने वाले थे। मैं हमीदिया अस्पताल पहले पहुंच गया था। यहां डा. हीरेश चंद्र मुझे मिले। जो फोरेंसिक साइंस डिपार्टमेंट के डायरेक्टर थे। उन्होंने मुझे देखकर एक दवा देकर खाने को कहा,लेकिन मेरे सामने लाशें पड़ी थीं। कुछ देर में प्रधानमंत्री आने वाले थे। कुछ ही मिनटों में उनका काफिला आ भी गया। वो सीधे वार्ड मैं पहुंचे और गैस प्रभावितों से मिले। इसके बाद शाम को गैस रिसाव की अफवाह उड़ने से फिर फील्ड मैं आना पड़ा। इस दौरान मैं बीमार हो गया था। मेरे फेफड़े खराब हो चुके थे। इलाज के चलते मुझे रोजाना CM, CS और तत्कालीन IG को रिपोर्ट देना होती थी।
ऑपरेशन फेथ अभियान का निर्णय हुआ तो 16 दिसंबर को पुराना शहर लगभग खाली हो गया। तब यूका प्लांट से मिक को निष्क्रिय करने की कार्रवाई चली। इस दौरान अफवाहों से शहर को बचाए रखने वे निरंतर अपनी टीम के साथ फील्ड में रहते। इस दौरान कई लोगों को नए शहर एवं भेल के अस्थायी कैंपों में ठहराया गया। वहीं पुनर्वास कार्यों के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी काफी परिश्रम करना पड़ा।