भास्कर एक्सक्लूसिव: जब मैंने हमीदिया अस्पताल में लाशों से भरे कमरा नं. 28 की तस्वीर ली, तब स्वास्थ्य मंत्री रेवनाथ सिंह पहुंच गए, उन्होंने डॉ. एनपी मिश्रा से कहा कि डॉक्टर साहब ये तो हमें मरवाएगा…

भास्कर एक्सक्लूसिव: जब मैंने हमीदिया अस्पताल में लाशों से भरे कमरा नं. 28 की तस्वीर ली, तब स्वास्थ्य मंत्री रेवनाथ सिंह पहुंच गए, उन्होंने डॉ. एनपी मिश्रा से कहा कि डॉक्टर साहब ये तो हमें मरवाएगा…


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भोपाल6 मिनट पहलेलेखक: राजेश गाबा

सीनियर फाेटाेग्राफर कमलेश जैमिनी जो यूनियन कार्बाइड के भी ऑफिशियल फोटोग्राफर रहे।

  • भोपाल गैस त्रासदी के साक्षी रहे फाेटाेग्राफर कमलेश जैमिनी ने उस रात के भयानक मंजर को अपने कैमरे में केद किया। जो अब दस्तावेज के रूप में है।
  • हमीदिया अस्पताल में 14 दिन तक उन्होंने रूककर हट घटना को कवर किया।

दो-तीन दिसंबर 1984.. यह गैस त्रासदी का वह दिन है जिसका जख्म भोपाल के लोगों के दिलों में आज भी ताजा है। पुराने लोग आज भी वह मंजर भूले नहीं हैं। जो इसकी पीड़ा झेल रहे हैं वे कई बार उस रात को याद कर सिहर उठते हैं। उस घटना को कमलेश जैमिनी ने अपने कैमरे में कैद किया जो फैक्टरी के ऑफिशियल फोटोग्राफर भी थे। 14 दिन तक वे घर नहीं गए थे। हमीदिया अस्पताल में लगे कैंप में उन्होंने माइक संभाला और अफरा-तफरी के माहौल को नियंत्रित किया। गैस त्रासदी की 36वीं बरसी पर कमलेश जैमिनी ने दैनिक भास्कर के साथ साझा की उस स्याह रात की कहानी….

मेरे पिताजी हरकृष्ण जैमिनी जी ने 1950 में फोटोग्राफी का काम शुरु कर दिया था। मैंने अखबारों के लिए फोटोग्राफी करना शुरु की। 1979 में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री आई काली परेड में। हमें ऑफर आया उसकी फोटोग्राफी का। वहां बड़ा प्लांट बनना था। उसके लिए एरियल फोटोग्राफ्स लेने थे। मेरे पिताजी ने पुष्पक विमान फ्लाइंग क्लब से लेकर उसमें बैठकर एरियल व्यू फोटोग्राफी की थी। हमें टॉस्क मिला कि एमआईसी प्लांट लगने की प्रोसेस की रोजाना फोटोग्राफी करनी है। हम हर दूसरे दिन तस्वीरें खींचते थे जो कंपनियों को जाते हैं। वहां पर प्रोडक्शन एमआईसी प्लांट डला।

2-3 दिसंबर 84 की वह भयानक रात आज भी याद है मुझे। वो 2 तारीख की रात थी। गैस निकली और भगदड़ मच गई। उसी वक्त हमारे दादा की डेथ हुई थी। हमारे घर में शोक का तीसरा दिन था। मैं उस वक्त अखबार के लिए फोटोग्राफी करता था। मेरे ब्यूरो चीफ मदन मोहन जोशी जी ने कहा कि कमलेश देखो बड़ा हादसा हुआ है हमीदिश अस्पताल और जेपी नगर पहुंचकर कवर करो। उसी वक्त मेरी बहन संध्या ने आवाज दी। दादा कुछ हुआ है यूनियन कार्बाइड में लोग भाग रहे हैं। तभी मैंने देखा कि ताजुल मस्जिद की तरफ से आ रहे थे। तीन दिन से हमारी दुकान बंद थी। घर दुकान एक होने के कारण रास्ता एक ही था। मैंने कैमरे का बैग उठाया, तुरंत 7 फिल्में लोड की। स्कूटर पर हमीदिया अस्पताल की ओर चल दिया। देखा लोग भाग रहे थे। अप्ऊरा-तफरी थी। तभी एक ठेले में व्यक्ति परिवार को बिठाकर तलैया की तरफ भाग रहा था। मैंने वो तस्वीर क्लिक की।

मैं जैसे ही हमीदिया अस्पताल पहुंचा। इमरजेंसी के बाहर भीड़ लगी हुई थी। वहीं मैंने कुछ तस्वीरें बनाई। पूरा कॉरिडोर मरीजों से भरा था। एक-एक करके मरीज आ रहे थे। वहीं एक बच्चा मर चुका था। उसका पिता रो रहा था चिल्ला रहा था।डॉक्टर साहब देखो मेरे बेटे को क्या हो गया। उसे जल्दी ठीक करो। उसे आशा थी, शायद वाे बच जाएगा। इसके बाद मैंने दो-तीन बच्चों को देखा, जिनके मुंह से झाग निकल रहा था। थोड़ी देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया। अस्पताल में एक कमरा था जहां डॉक्टर्स की टीम मरीजों को देख रही थी। सबसे पहले एक बच्ची की डेड बॉडी आई। जिसके मुंह और नाक से झाग निकल रहा था। इसके बाद तो एक के बाद एक मरीज और डेड बॉडी आने का सिलसिला शुरु हो गया। तभी एक महिला को लाया गया जो पूरी जल चुकी थी। गैस आंखों में लगने के कारण उसे दिखा नहीं और वह भट्ठी में गिर गई थी। मैंने वो तस्वीर क्लिक की।

तभी उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री रेवनाथ चौरे और नेता लक्ष्मीनारायण शर्मा अस्पताल हुंच गए। इन दोनों में आपस में नोंक-झोंक हुई। मैंने उस तस्वीर को भी खींचा था। उसके बाद जो मरीज सरवाइव नहीं कर रहे थे। उनकी लाशों को अस्पताल के कमरा नंबर 28 में डंप किया जा रहा था। वहां इतनी सारी लाशें रखीं कि कमरा भर गया। मैं उनकी फोटोग्राफ्स ले रहा था तभी खिड़की से फ्लैश लाइट बाहर निकली यह देखकर स्वास्थ्य मंत्री रेवनाथ चौरे ने डॉ. एनपी मिश्रा से कहा देखो डॉक्टर साहब कोई तस्वीरें ले रहा है। हमें मरवाएगा। तभी दरवाजा खुला तो मैं सामने था। डॉक्टर एनपी मिश्रा ने मुझसे भला-बुरा कहा।

उसके बाद मैंने एक चक्कर यूनियन कार्बाइड और जेपी नगर का लगाया। वहां भी तस्वीरें लीं। बहुत ही भयावह मंजर था। जो जेपी नगर बस्ती में घर के बाहर सो रहे थे। सोते ही रह गए। उनकी आंखों से खून निकल रहा था। जानवर भी मरे पड़े थे। जहां कभी चहल-पहल रहती थी। वहां सन्नाटा पसरा हुआ था।

गैस इतनी जहरीली थी कि शरीर के अधिकांश अंगों को डेमेज कर दिया था। मेरे हाथ में पोस्टमार्टम की कुछ तस्वीरें आईं तो देखा कि किडनी और लीवर ऐसे निशान थे मानों गोलियां से छलनी कर दिया। इतनी बड़ी त्रासदी के वक्त जो प्रशासन की महती भूमिका होनी चाहिए वो नहीं दिखी। न सायरन बजाकर लोगों को अलर्ट किया गया। न ही व्हीकल से ये अनाउंस किया कि लोगो का क्या करना है, कैसे बचना है। अफरा-तफरी के अलावा शहर में कुछ नहीं था। हमीदिया में 15 दिन के प्रवास में देखा कि लोग ज्यादा से ज्यादा मरीजों की सेवा में डटे रहे। मुझे वहां जगह मिली।वहां मुझे आकाश रेडियो वाले एहसान भाई ने माइक सिस्टम दिया। ताकि मैं अफरा-तफरी को कंट्रोल कर सकूं। इस दौरान प्रधानमंत्री राजीव गांधी आए, मदर टेरेसा आईं। मैंने हमीदिया अस्पताल में जो भी घट रहा था वो सब अपने कैमरे में कवर किया। वो फोटोग्राफ्स दस्तावेज हैं। उस त्रासदी के उस देखकर मौत का वो तांडव सामने आ जाता है।



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