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- While Taking Pictures Of The Corpses, Their Hands Did Not Lose Their Trembling Courage, Even Today The Whole Sky Is Moving Before My Eyes.
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भोपाल7 मिनट पहलेलेखक: राजेश गाबा
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सीआईडी विभाग में इंस्पेक्टर (फोटोग्राफी) सीमा कुलश्रेष्ठ
- गैस त्रासदी के वक्त सीआईडी में क्राइम फोटोग्राफर सब इंस्पेक्टर सीमा कुलश्रेष्ठ ने खींची थी लाशों की तस्वीरें
- त्रासदी के बाद कईं सालों तक आंदोलन को भी किया था कवर
20 साल की उम्र में पुरुषों के एकाधिकार क्षेत्र क्राइम फोटोग्राफी में मध्यप्रदेश की पहली महिला फोटोग्राफर बनीं। पहली ही पोस्टिंग भोपाल में सब इंस्पेक्टर सीआईडी विभाग में हुई। पहला ही बड़ा टॉस्क मिला गैस त्रासदी में लाशों की तस्वीरें खींचने का। लाशों की तस्वीरें खींचते वक्त उनके हाथ कांपे पर हिम्मत नहीं हारी। कई दिनों तक लाशों का वो मंजर उनकी आंखों के सामने घूमता रहा। वर्तमान में सीआईडी विभाग में इंस्पेक्टर (फोटोग्राफी) सीमा कुलश्रेष्ठ की कहानी उन्हीं की जुबानी…
मेरी पहली महिला पुलिस फोटोग्राफर सब इंस्पेक्टर के रूप में भोपाल में नियुक्ति हुई अगस्त 1984 में। अभी हम लोगों की इनहाउस ट्रेनिंग चल ही रही थी। क्योंकि सामान्य फोटोग्राफी और क्राइम फोटोग्राफी में काफी अंतर होता है। हम लोगों को कैमरे के बारे में फोटोग्राफी के बारे में बताया जा रहा था। हमारा कोई एक्सपोजर नहीं था लाशों के साथ या क्राइम सीन के साथ। अभी तो हमने अगस्त में जॉइन ही किया था और दिसंबर में यह ट्रेजडी हो गई।
हमें उस वक्त गौतम नगर में क्वार्टर मिला था मैं वहां रहती थी। वहां तक गैस की पता नहीं चली थी। काफी लोग भागकर उस एरिया में आए थे। जैसे ही हम लोगों को सुबह सूचना मिल गई कि जल्दी ऑफिस पहुंचिए। किसी को जानकारी नहीं थी। वैसे हम 10:00 बजे पहुंचते थे। उस दिन सुबह 8 बजे ही पहुंच गए। वहां अफरा-तफरी का माहौल जहांगीराबाद में था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। बिल्कुल किसी को कोई जानकारी नहीं था। फिर किसी ने कहा कि कोई एमआईसी नाम की जहरीली गैस निकली है। हमको कहा गया कि कंट्रोल रूप जाकर रिपोर्ट करिए अपने कैमरा के साथ। मैं कंट्रोल रूम चली गई। सिटी कोतवाली में है जहां आजकल। वहां से हमें एक एसडीएम महोदय के साथ जाने के लिए कह दिया गया। मेरी ड्यूटी यूनियन कार्बाइड के सामने जेपी नगर में लगी। जहां सबसे ज्यादा इस गैस का असर हुआ था।
मेरी उम्र उस वक्त 20 साल थी। हालांकि मुझे इंटरव्यू में बताया कि आपको क्राइम सीन में लाश की फोटोग्राफी करनी पड़ेगी। लेकिन एक आधी लाश की बात कुछ और होती है। लेकिन जब आप जाएं तो देखें कि जानवर मरे पड़े हैं, महिलाएं-पुरुष-बच्चें मरे पड़े हैं। अनगिनत लाशें जब देखें तो एक बीस साल की लड़की के दिल-दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। मैं भौचक्की रह गई। समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे फोटोग्राफी करुं, अपने इमोशंस को कैसे कंट्रोल करुं। उस वक्त रील वाले कैमरे चलते थे। मेरे पास दो-तीन रीलें थीं। मैंने लाश की फोटोग्राफी की। तब रीलें खत्म हो गई। इसके बाद हम टीम के साथ लाशों को निकलवाने में लग गए। उधर डेयरी थी। वहां भैंस के पेट फूल गए थे। गैस के कारण ऐसा लग रहा था कि कब पेट फट जाएगा। पूरी बस्ती सुनसान थी।
दूधमुंहे बच्चे, महिलाएं, औरतें घर के अंदर भीतर बुत बने पड़े थे। जानवर भी मरे पड़े थे किसी के मुंह से झाग निकल रहा था तो किसी की आंखों से खून। उस जहरीली गैस ने किसी को नहीं बख्शा। सिर्फ मुर्गियां घूम रही थीं। शायद उन पर गैस का कोई असर नहीं हुआ था। वह दृश्य इतना भयावह था कि मैं आपको शब्दों में बयां नहीं कर सकती। जब तक अंधेरा नहीं हुआ हम वहां पर डटे रहे। उसके बाद शाम को हम कंट्रोल रूप में आए रीलें जमा करा दी। रात भर मुझे नींद नहीं आई। वहां का मंजर मेरी आंखों के सामने आ रहा था। मुझे चक्कर उल्टी और मितली आ रही थी। शायद गैस का कुछ असर था। हमीदिया अस्पताल तो लाशों से पट गया था। पूरा भोपाल जैसे वीरान सा हो गया था। घटना के तीन दिन बाद मैं ऑफिस जा रही थी तो चक्कर खाकर गिरी और मेरा एक्सीडेंट हो गया। सिर फट गया, चेहरे पर चोंट आई। मुझे जेपी अस्पताल में एडमिट कराया गया। वहां का मंजर तो और भयानक था। मेरे आजू-बाजू में लेटे गैस पीड़ित में से हर तीसरे मिनट में एक व्यक्ति की मौत हो रही थी। पूरा हॉस्पिटल मरीजों से पटा था। रोने-चीखने चिल्लाने की आवाजें लगातार आ रही थीं। चौथे दिन फिर एक अफवाह उड़ी की एक बार फिर से गैस निकली है। लोग अस्पताल से भी भागने लगे और भगदड़ मच गई। जो लोग गैस का शिकार हो चुके थे। उनके फेफड़ों में गैस का असर था। उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। भागने और सांस फूलने से भी वो दम तोड़ रहे थे। हांफने की वजह से उनका ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा था।
मेरा तो गैस त्रासदी और यूनियन कार्बाइड से एक रिश्ता बन गया। उसके बाद इकबाल मैदान में जितनी भी शांति सभा, रैलियां हुईं। उसके मैंने कवर किया। बच्चे को लेकर मां की मूर्ति लगने से लेकर मशाल जुलूस सभी में मेरी ड्यूटी लगी। तीन सालों तक गैस से जुड़ी हर एक्टिविटीज को मैंने कैमरे में कैद किया। मैं रैलियों में आयोजनों में सिविल ड्रेस में पहचान छुपाकर जाती थी। पुलिस और प्रशासन के प्रति लोगों में भयंकर गुस्सा भरा हुआ था। मुझे सीनियर्स ने पहचान छुपाने के लिए कहा था तो मैं पत्रकार बताकर इवेंट को कवर करती थी। आज फिर उस त्रासदी की बरसी है तो वह मंजर हूबहू मेरी आंखों के सामने आ जाता है।