जारी है बच्चों की मौत का रूदन: महाकौशल के कई जिलों में हर दूसरे दिन उजड़ रही एक कोख, जबलपुर में नौ महीने में 679 बच्चों की मौत

जारी है बच्चों की मौत का रूदन: महाकौशल के कई जिलों में हर दूसरे दिन उजड़ रही एक कोख, जबलपुर में नौ महीने में 679 बच्चों की मौत


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जबलपुर18 मिनट पहले

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एल्गिन के एसएनसीयू में भर्ती नवजात

  • गर्भ में मौत का आंकड़ा सर्वाधिक 406, वहीं एल्गिन के एसएनसीयू में 10 महीने में 190 बच्चों की थम गई सांसें

शहडोल में बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य सेवाओं के साथ शासन की योजनाओं की कलई खोल दी। शहडोल जैसे ही हालात महाकौशल के दूसरे जिलों में भी है। मंडला में 243 दिनों में 298 बच्चों की मौत हो गई। जबलपुर में नौ महीने में 679 नवजातों ने दम तोड़ दिया। इसमें 406 की तो गर्भ में ही सांसें थम गईं। एल्गिन के एसएनसीयू (सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में 10 महीने में 190 बच्चों की सांसें थम गईं। हालांकि यहां के चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ ने विपरीत हालात में लाए गए 76 प्रतिशत मासूमों की जिंदगी बचा ली। एसएनसीयू में पदस्थ चाइल्ड डॉक्टर विजय जायसवाल के मुताबिक बच्चों की मौत की बड़ी वजह प्री-मैच्योर डिलिवरी और अंडरवेट (185 ग्राम से कम) बच्चों का जन्म होना है।

एल्गिन जिला अस्पताल जबलपुर

एल्गिन जिला अस्पताल जबलपुर

नौ महीने में जिले में 16 हजार से अधिक बच्चों का जन्म
जबलपुर के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक नौ महीने में 16 हजार 100 बच्चों ने जन्म लिया। इसमें 15 हजार 920 का जन्म अस्पतालों में और अन्य का घर या रास्तों में हुआ। 72 प्रसूताओं की डिलिवरी के दौरान मौत हो गई। वहीं 406 मृत बच्चों ने जन्म लिया। 273 बच्चे पैदा तो हुए, लेकिन एक वर्ष के अंदर ही दम तोड़ दिए।

आंकड़ों में बयां कर रहे तस्वीर
ब्लॉक कुल डिलीवरी अस्पताल में डिलीवरी प्रसूता की मौत मृत जन्म 24 घंटे में मृत्यु 30 दिन में मृत्यु एक वर्ष में मौत
जबलपुर 10005 9954 62 309 31 117 07
कुंडम 796 760 02 14 05 03 05
मझौली 788 756 01 14 07 09 14
पनागर 781 770 00 09 01 06 03
पाटन 1131 1117 01 12 03 10 07
शहपुरा 1276 1270 02 20 11 09 07
सिहोरा 1323 1293 04 28 03 09 06

एल्गिन जिला अस्पताल की ये है तस्वीर
एल्गिन जिला अस्पताल में औसतन प्रतिदिन 30 महिलाओं की डिलीवरी होती है। अस्पताल में हर तीन दिन में दो बच्चों की मौत हो रही है। इसमें भी ग्रामीण परिवेश वाली प्रसूताओं की संख्या 80 प्रतिशत के लगभग है। 190 बच्चों की यहां दस महीने में मौत हुई है। जबकि 68 बच्चों ने गर्भ में ही दम तोड़ दिया।

एल्गिन में होने वाली डिलीवरी और बच्चों की मौत का आंकड़ा
वर्ष 2017-18 2018-19 2019-20 2020-21
प्रसव 9812 10478 9549 5065
जन्म 9691 10301 9393 4997
गर्भ में मौत 121 177 156 68
जन्म के बाद मौत 145 111 134 190

गर्भावस्था की लापरवाही पड़ती है बच्चों पर भारी
एल्गिन जिला अस्पताल की चाइल्ड विशेषज्ञ डॉक्टर विजया जायसवाल के मुताबिक गर्भावस्था में की गई लापरवाही बच्चों पर भारी पड़ती है। 90 प्रतिशत ऐसे सामने आते हैं, जो गर्भावस्था के दौरान एक बार भी चिकित्सक को नहीं दिखाते हैं। 16 प्रतिशत डिलीवरी प्री-मेच्योर होती है। इसमें भी अधिकतर की डिलीवरी घर में या फिर रास्ते में हो जाती है। बच्चा किस कठिनाई से पैदा हुआ, उन्हें पता हीं नहीं होता। 34 हफ्ते से पहले पैदा होने वाले बच्चों का सही विकास नहीं हो पाता है। ब्रेन में ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं हो पाता है। सांस लेने में कठिनाई आती है। ब्रेन में हाईपोक्सिया हो जाता है। उसके बाद एनीमिया और झटके आने लगते हैं। बच्चें को गंभीर हालत में एसएनसीयू में वे लाते हैं। 13 प्रतिशत बच्चों की मौत हो जाती है।

नवजात को दूध पिलाते हुए

नवजात को दूध पिलाते हुए

ये लापरवाही पड़ती है भारी
डॉक्टर विजया के मुताबिक प्रीमेच्योर बच्चे के शरीर का तापमान 99.5 फारेनहाइट होना चाहिए। इसके लिए बच्चों को केएमसी (कंगारू मदर केयर) जरूरी है। इसमें छाती से लगाकर बच्चों को शरीर की गरमी दी जाती है। यह मां व पिता दोनों कर सकते हैं। वहीं मां को हर डेढ़ दो घंटे में स्तनपान करना चाहिए। इससे उसका तेजी से विकास होगा और खतरा टल जाएगा। प्री-मेच्योर डिलीवरी या अंडरवेट जन्म लेने वाले बच्चों की देखभाल में अधिक सावधानी दिखानी चाहिए। अमूमन मां घर के कामों में व्यस्त हो जाती है। बच्चा भूख से रो कर थक जाता है। उसे केएमसी भी नहीं मिल पाता। इसके बाद हालत बिगड़ती है।

केएमसी (कंगारू मदर केयर) का ये है बेहतर तरीका

केएमसी (कंगारू मदर केयर) का ये है बेहतर तरीका

मौत की एक बड़ी वजह ये
एल्गिन अस्पताल के डॉक्टर संजय मिश्रा के मुताबिक बच्चों की मौत की सबसे बड़ी वजह अंडरवेट और प्रीमेच्योर डिलीवरी है। 800 और एक किलो तक के बच्चे जन्म लेते हैं। कई बार डिलीवरी के लिए समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाते हैं। ऐसे में पेट का पानी निकल जाता है। बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है। प्री-मेच्योर बच्चे का फेफड़ा भी विकसित नहीं होता, ऐसे में उन्हें सांस लेने में परेशानी आती है और झटके शुरू हो जाते हैं।
मंडला में भी भयावह है तस्वीर
मंडला (निवास) के कांग्रेस विधायक डाक्टर अशोक मर्सकोले ने मंडला जिले के अस्पतालों में हुए नवजातों की मौत के आकड़े जारी किए हैं। आंकड़ों में एक अप्रैल से 30 नवंबर तक 243 दिनों में लगभग 298 नवजातों की मौत हुई है। मंडला जिला अस्पताल के एसएनसीयू में दस महीने में 146 नवजात दम तोड़ चुके है। मंडला जिला अस्पताल में भी डॉक्टर व पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है।

कुपोषण है बड़ी समस्या

आदिवासी बहुल जिलों में प्रसूताओं में पोषण की कमी और एनीमिया के चलते अंडरवेट बच्चे पैदा हो रहे हैं। जबकि सरकार पोषण आहार पर हर महीने लाखों रुपए खर्च कर रही है। मंडला के सीएमएचओ श्रीनाथ सिंह के मुताबिक नवजातों की मौत के कई कारण हैं। डॉक्टर व अस्पताल की लापरवाही कहीं भी साबित नहीं हुई है।



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