मुख्यमंत्री भावांतर योजना को मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन, मंदसौर गोलीकांड के बाद और विधानसभा चुनाव के एक साल पहले खूब जोर—शोर से शुरू किया गया, लागू किया गया, और उसकी उपलब्धियों पर चुनाव के वक्त खूब होर्डिंग्स भी लगाए गए. यह अलग बात है कि इससे शिवराज सिंह चौहान की तब वैतरणी पार नहीं लगी. जनता ने उन्हें पूर्ण जनादेश से दूर रखा.
कानून के पक्ष में माहौल बनाने की तैयारी
अब एक बार फिर देश में किसान सड़कों पर है, इस बार चर्चा में वे तीन कृषि कानून जिन्हें देश की खेती पर खतरा बताया जा रहा है, और प्राथमिकता में है न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून में लिखित रूप में दर्ज करने की मांग. दिल्ली में किसान आंदोलन चल रहा है. इसके पक्ष—विपक्ष के कई तरह के नैरेटिव्स हर दिन निकलकर सामने आ रहे हैं. किसान और सरकार दोनों ही अड़े हैं, आंदोलन हर दिन आगे बढ़ रहा है, फिलहाल प्रधानमंत्री के ताजा बयान के बाद कुछ उम्मीद बंधी है कि बातचीत के रास्ते खुलेंगे, लेकिन इस बीच भारतीय जनता पार्टी वाले राज्य हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि इन कानूनों के पक्ष में हर संभव माहौल बनाया जाए.
सारे नेता छिपा रहे असलियत
इसमें सबसे आगे हैं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिन्होंने राज्य में हर तरफ किसान सम्मेलन के जरिए कानूनों पर जनता के समर्थन को दिखाने की कोशिश की है, वे तमाम टीवी चैनलों पर कानूनों के बनने के बाद ऐसे उदाहरण पेश कर रहे हैं जिनमें किसानों को इन कानूनों के जरिए भुगतान प्राप्त हो पाया है. होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील में देश का ऐसा पहला मामला भी दर्ज हो गया है जहां कि एसडीएम ने अनुबंध का उल्लंघन करने पर किसान के हक में फैसला सुनाया है, लेकिन यह एक घर आगे की बात है. पहली बात यह है कि क्या किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पा रहा है. इस बात को सारे नेता बड़ी आसानी से छिपाए जा रहे हैं.
किसानों को नहीं मिल रही एमएसपीजिस वक्त में यह आंदोलन चल रहा है उस वक्त भी मध्यप्रदेश के अंदर किसी भी मंडी में न तो गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पा रहा है, न मक्के का और कुछ महीने पहले मूंग की बंपर पैदावार के बावजूद उसका एक भी दाना समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदा गया. यही डर किसानों के मन में बैठा है कि जब मंडियों के बावजूद न्यूनतम समर्थन मूल्य का यह हाल है तो यदि मंडी का सिस्टम खुले बाजार में दम नहीं भर पाया तो फिर आगे चलकर उनकी फसलों का क्या होगा. आखिर वह क्या सिस्टम बने जिससे कि किसी भी राज्य को भावांतर जैसी योजना लेकर नहीं आनी पड़े, केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए ही उन्हें अपनी फसल के ठीक—ठीक दाम का भरोसा मिल जाए.
भावांतर में दिखी गड़बड़ी
मध्यप्रदेश में जब भावांतर की यह योजना लागू की गई थी तो उसके पहले ही पन्ने पर शिवराज सिंह ने लिखा था कि वह किसान पुत्र हैं और मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे अपने खेतों में फसल उगाते हैं. वह फसलों के भावों के उतार—चढ़ाव से भी वाकिफ हैं और इसी से बचाने के लिए भावांतर योजना लागू कर रहे हैं. इस योजना को सरल रूप में समझें तो जिस भाव में किसान फसल बेचता है और जो न्यूनतम समर्थन मूल्य है इन दोनों के बीच के अंतर की राशि को सरकार ने किसानों के खातों में सीधे देने की कवायद की. इस योजना से किसानों को जहां राहत मिली वहीं कई स्तरों पर गड़बड़झाले भी सामने आए. कई जिलों में जो फसलें पैदा ही नहीं होती हैं उनका भी भावांतर दे दिया गया. कई किसानों ने इस योजना में पंजीयन कराके फसल बेच दी, लेकिन उनका भुगतान महीनों तक अटका रहा. यह आरोप भी लगे कि इस योजना का असली फायदा किसानों नहीं व्यापारियों को हो रहा है. योजना के पंजीयन में कई जटिलताएं बताई जा रही थीं और जिस तरह से भावांतर की गणना की जाती थी वह भी सामान्य किसानों के पल्ले नहीं पड़ रहा था.
कमलनाथ सरकार ने की कोशिश
बहरहाल सत्ता बदलने के बाद कमलनाथ सरकार ने इस योजना के बेहतर जमीनी क्रियान्वयन की बजाए कर्ज माफी को प्राथमिकता दी, बतौर मुख्यमंत्री उनकी टेबल पर आने वाली पहली फाइल ही किसानों के कर्जमाफी की थी, लेकिन यह रातों रात पूरी तरह से हो नहीं सकती थी, और विपक्ष ने भी इस मुददे को ऐसे पेश कर दिया गया कि कर्जमाफी हुई ही नहीं.
अब सवाल यह है कि मौजूदा वक्त में जब न्यूनतम समर्थन मूल्य ही घाटे में जाते किसानों के लिए एक आशा की किरण है तो उसे कानून में शामिल करने की मांग को सरकार क्यों नहीं मान रही है. जब शिवराज सिंह चौहान जैसे जमीनी किसान नेता वास्तविकता को समझते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ देने के लिए भावांतर जैसी योजना को लागू करते हैं, तो यह एक बेहतर मौका है जब इसे सरल करते हुए किसानों के हक में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागू कर दिया जाए, यह मानते हुए कि यह पैसा वापस बाजार में ही आना है और इससे भारत की अर्थव्यवस्था ठीक उसी तरह मजबूत होगी जैसे कि सरकारी कर्मचारियों को छठे—सातवें—आठवें वेतनमान के देने से होती है.