तीन राज्य इस तरह के विधेयक बना चुके हैं, जिनमें खबरों के मुताबिक यह बात तो एक सी है कि धर्म परिवर्तन के मकसद से की गई शादियों को खारिज किया जाएगा और यह भी बात कॉमन है कि बगैर पूर्व सहमति के इस तरह की शादियां साबित हुईं तो दोषियों को सज़ा दी जाएगी. लेकिन सज़ा क्या होगी और किस तरह, इस बारे में तीनों कानून अलग हैं. आइए जानें क्या कहते हैं ये तीन कानून.
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पूर्व सूचना को लेकर क्या है नियम?मप्र के कानून के मुताबिक ‘धर्म परिवर्तन के लिए इच्छा संबंधी घोषणापत्र’ जिला मजिस्ट्रेट के पास देना होगा और इसके 60 दिन बाद ही धर्म परिवर्तन और शादी मान्य व वैधानिक होगी. उप्र में पूर्व सूचना का यह नियम 60 दिनों का ही है, लेकिन साथ में यह भी प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट पुलिस जांच करवाकर यह जांचे कि धर्म परिवर्तन जबरन तो नहीं करवाया जा रहा.
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इनसे अलग, हिमाचल के धर्म स्वतंत्रता एक्ट 2019 के मुताबिक 30 दिन पहले प्रशासन को सूचित किया जाना चाहिए.
कौन कर सकता है जांच?
मप्र में बन रहे कानून के सेक्शन 4 में उल्लेख है कि धर्म परिवर्तन के शिकार व्यक्ति या उसके पैरेंट्स/भाई/बहन के धर्म परिवर्तन संबंधी लिखित शिकायत मिलने पर ही पुलिस जांच संभव होगी. धर्म परिवर्तन के शिकार व्यक्ति के अभिभावक कोर्ट की इजाज़त के बाद शिकायत दर्ज करवा सकेंगे. यह भी कि ऐसे मामलों में सब इंस्पेक्टर रैंक से नीचे का पुलिस अफसर जांच नहीं कर सकेगा.
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मप्र के कानून में ये प्रावधान उप्र के कानून की तर्ज़ पर ही हैं. वहीं, हिमाचल के कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में पुलिस जांच के लिए कम से कम एसडीएम रैंक के अफसर की पूर्व अनुमति ज़रूरी होगी.
कैसे साबित होगी बेगुनाही?
मप्र और हिमाचल के कानून यहां एक जैसे हैं कि जिस व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन करवाया है, वो साबित करे कि धर्म परिवर्तन गैर कानूनी ढंग से या जबरन नहीं हुआ. लेकिन उप्र का कानून इस बारे में थोड़ा विस्तृत है. इसके मुताबिक न केवल धर्म परिवर्तन कराने वाले, बल्कि इसमें साथ देने वाले, पता होने के बावजूद इसे रोकने की कोशिश न करने वाले, ऐसा करने के लिए उकसाने वाले आदि कई लोग आरोप के दायरे में होंगे और उन्हें बेगुनाही साबित करनी होगी?
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सज़ा के प्रावधान क्या हैं?
तीनों ही प्रदेशों के कानूनों में कॉमन बात यह है कि ऐसे मामलों को गैर जमानती और संज्ञेय माना गया है यानी गिरफ्तारी बगैर वॉरंट के हो सकती है और जमानत मिलना जज के संज्ञान पर निर्भर करता है. रही बात सज़ा की तो, मप्र के कानून के मुताबिक धर्म परिवर्तन के दोषी को 1 से 5 साल तक की कैद हो सकती है, लेकिन जिसका धर्म परिवर्तन कराया गया, वह महिला या अवयस्क या अनुसूचित जाति/जनजाति का व्यक्ति हो तो सज़ा 10 साल कैद और धर्म परिवर्तन कराने के लिए शादी की गई तो भी 10 साल तक की कैद की सज़ा संभव है.
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उप्र कानून के हिसाब से ऐसे मामलों में कम से एक साल की कैद तो होगी ही, जो पांच साल तक बढ़ाई जा सकेगी. यह जुर्म दोहराए जाने की स्थिति में अधिकतम सज़ा की दोगुनी सज़ा तक मुमकिन होगी. वहीं, हिमाचल में एक से पांच साल तक की कैद गैरकानूनी धर्म परिवर्तन के लिए मुकर्रर है, लेकिन पीड़ित के महिला, अवयस्क एससी/एसटी व्यक्ति होने की सूरत में सज़ा 7 साल तक की कैद हो सकती है.
महिला के लिए मेंटेनेंस अधिकार?
उप्र और हिमाचल प्रदेश के कानूनों में इस बात का उल्लेख नहीं है कि जब धर्म परिवर्तन के मकसद से की गई शादी को शून्य यानी अमान्य करार दिया जाएगा, तो पीड़ित महिला और उसके बच्चों के अधिकारों का क्या होगा! मप्र के कानून में सेक्शन 9 के तहत प्रावधान किया गया है कि ऐसी सूरत में महिला को गुज़ारा भत्ता मांगने और पाने का अधिकार होगा.
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पुराने कानून थे तो नए क्यों?
हिमाचल और मप्र उन 10 राज्यों में शुमार हैं, जहां धर्म परिवर्तन के खिलाफ पहले से कानून थे, लेकिन नए कानूनों में सबसे अहम फर्क ये है कि सिर्फ कन्वर्जन के मकसद की गई शादियों के मामले में सज़ा के प्रावधान किए गए हैं. मप्र में 1968 और हिमाचल में 2006 से इस तरह के कानून प्रभावी थे, जिनमें धर्म परिवर्तन संबंधी मामलों की सुनवाई और कार्यवाही होती थी.
वहीं यूपी में राज्य के विधि आयोग की 2019 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों के लिए एक खास किस्म के कानून की ज़रूरत है. इस सिफारिश के बाद राज्य ने कानून बनाने की कवायद की.