बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को लेकर मध्य प्रदेश के सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने जताया रोष. (सांकेतिक तस्वीर)
भोपाल. ”नाबालिग के वक्षस्थल को छूना यौन हमला नहीं माना जा सकता. यौन हमले के लिए त्वचा से त्वचा का संपर्क (Skin to Skin Contact) होना जरूरी है. इसे पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत परिभाषित नहीं किया जा सकता.” एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) की नागपुर बेंच से आए इस विवादित फैसले से बच्चों और महिलाओं के हितों और अधिकारों को लेकर काम करने वाले संगठन बेहद नाराज हैं. मध्य प्रदेश के अनेक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि इस फैसले का छेड़छाड़, छेड़छाड़ की कोशिश, यौन हमलों जैसे प्रकरणों में व्यापक विपरीत असर पड़ सकता है.
बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay HighCourt) की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला(Pushpa Ganediwala) ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि यौन हमले(Sexual assault) का कृत्य माने जाने के लिए ‘यौन मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना’ जरूरी है. उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज वक्षस्थल छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है. उन्होंने एक सत्र अदालत के फैसले को संशोधित करते हुए 12 साल की नाबालिग पीड़िता का यौन उत्पीड़न करने के आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा से बरी कर दिया. उस पर शील भंग करने की धारा 354 के तहत अपराध चलेगा, जिसके तहत एक साल तक की सजा हो सकती है.
न्याय व्यवस्था कितनी पितृसत्तात्मक?
मध्य प्रदेश की संगिनी महिला संस्था की प्रार्थना मिश्रा बेहद नाराजगी भरे स्वरों में कहती हैं कि स्तन को किसी वस्तु या अन्य चीज़ से टटोलेंगे तो वो यौनिक हिंसा नहीं होगी. हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति के इस फैसले से साफ पता चलता है कि हमारी न्याय व्यवस्था कितनी पितृसत्तात्मक है. ऐसे ही निर्णय हुए तो वो दिन दूर नहीं जब कोई भी इस तरह की साफ करके बच जाएगा. इस तरह के अपराध में न्याय का ही सहारा होता, लेकिन अब न्याय की उम्मीद भी करना बेकार है. अगर ऐसे होगा न्याय तो बच्चों और महिलाओ के मुद्दे पर संवेदनशील न्याय व्यवसाय की जरूरत है.
फैसला शर्मनाक और चिंताजनक
लैंगिक समानता के मुद्दे पर काम रहीं भोपाल की सामाजिक कार्यकर्ता कुमुद सिंह का कहना है कि ‘हम तो बार-बार यह मुद्दा उठा रहे हैं कि हर नागरिक में और विशेष तौर पर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में जेंडर संवेदनशीलता पैदा करने और बढा़ने के लिए ओरियन्टेशन होना ही चाहिए. ये फैसला शर्मनाक और चिंताजनक है कि जहां से न्याय मिलना चाहिए, वहां ऐसे असंवेदनशील लोग बैठे हैं और उससे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि यह फैसला एक महिला का है.’
खतरनाक फैसला, वो भी महिला न्यायमूर्ति का
मध्य प्रदेश में बाल अधिकारों के मुद्दे पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चियों की छाती दबोचने को लेकर आया यह फैसला बहुत खतरनाक फैसला है. जज खुद एक महिला हैं. कभी-न-कभी तो उन्होंने भी इन सब चीजों का सामना किया होगा. सबसे पहले तो ऐसे केस न्यायालय तक पहुंचते ही नहीं और जो पहुंचते हैं, उसका ये हश्र होता है. अगर एक महिला जज इस तरह का फैसला सुनाती हैं, तो किससे न्याय की उम्मीद की जाए. यह फैसला जज की अपनी सोच और मानसिकता का नतीजा है.
मानव अधिकारों की अवहेलना करने वाला फैसला
बाल अधिकार कार्यकर्ता सुश्री उपासना बेहार बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले को शर्मनाक बताते हुए कहती हैं कि यह फैसला न केवल बच्चियों/महिलाओं के खिलाफ है, बल्कि यह महिला अधिकार कानूनों की अवहेलना करता है. इस केस में आरोपी के ऊपर पॉक्सो एक्ट लगना चाहिए, इस निर्णय का उल्लेख कर आगे कई आरोपी द्वारा फायदा उठाया जा सकता है, यह फैसला पॉक्सो एक्ट को और उसकी मंशा को कमजोर करता है.
बेहूदा फैसला, इससे तो बढ़ेंगे अपराध
महिलाओं और बच्चों के बेहतर जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बरसों से काम करने वाले मप्र महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. सुरेश तोमर कहते हैं कि ‘स्किन टू स्किन कान्टेक्ट होने पर ही यौन हमला मानने वाला यह बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला समझ से परे है. इस मामले में तो सत्र न्यायालय से सजा पा चुके अपराधी को पॉक्सो एक्ट से बरी किया जा रहा है. पता नहीं महिला जज साहिबा ने किस मानसिकता, किस दबाव में यह फैसला दिया.’ उन्होंने कहा, ‘बच्चों के साथ होने वाले अपराधों को लेकर पॉक्सो एक्ट इतना स्पष्ट और सख्त प्रावधानों वाला है कि उसमें अपराधी को बचने के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं है. पॉक्सो एक्ट में साफ लिखा है कि किस तरह के कृत्य को सेक्सुअल असाल्ट माना जाएगा. यह फैसला तो बच्चों को न्याय की दिशा में न केवल बहुत ही बुरा उदाहरण, बल्कि बेहूदा और अश्लील भी है.’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में ऐसे फैसलों से एटीट्यूट दिखाने वाले न्यायमूर्तियों का शायद यह अंदाजा नहीं है कि इनसे अपराध करने वालों का कितना बढ़ावा मिलेगा. अपराधी महिलाओं का मजाक बनाएंगे और कहेंगे कि मैंने तो जो कुछ किया वह कपड़े के ऊपर से किया था, ये कानूनन कोई यौनिक हिंसा तो है नहीं.
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा महिला आयोग
बता दें कि राष्ट्रीय महिला आयोग((National Women Commission) इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है. वहीं राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के चेयरपर्सन प्रियांक कानूनगो ने महाराष्ट्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील करने और तत्काल एक शिकायत एनसीपीसीआर के मुख्य सचिव के पास दर्ज कराने का आग्रह किया है. वहीं बचपन बचाओ आंदोलन, पीपुल्स अगेंस्ट रेप की योगिता भयाना, पॉपुलेशन फर्स्ट की डॉ. ए. एल शारदा, सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन, सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने फैसले की कड़ी आलोचना की है.
क्या कहता है POCSO एक्ट
बता दें कि POCSO कानून के तहत यौन हमले की परिभाषा है कि जब कोई ‘यौन मंशा के साथ बच्ची/बच्चे के निजी अंगों, वक्ष को छूता है या बच्ची/बच्चे से अपना या किसी व्यक्ति के निजी अंग को छुआता है या यौन मंशा के साथ कोई अन्य कृत्य करता है जिसमें संभोग किए बगैर यौन मंशा से शारीरिक संपर्क शामिल हो, उसे यौन हमला कहा जाता है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)