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- Warrant Issued Against IAS Officer Of 8 Crores Scam, Accused Summons Could Not Be Served In Five Years, About One And A Half Lakh Pages Were Challaned
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इंदौर6 मिनट पहले
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लगभग 19 साल पहले कृषि उपज मंडी में हुए आठ करोड़ के मंडी टैक्स घोटाले में तत्कालीन मंडी सचिव और वर्तमान में उपसचिव जेल विभाग व IAS अफसर रहे ललित दाहिमा के खिलाफ कोर्ट ने अब गिरफ्तारी का वारंट निकाल दिया है। वह समन तामिल होने से बच रहा था। मिली जानकारी के अनुसार फर्जी एड्रेस पर खुली बोगस व्यापरिक कंपनियों ने इस 8 करोड़ के घोटाले को जन्म दिया था जिसकी रिपोर्ट वर्ष 2004 में तत्कालीन मंडी सचिव व वर्तमान कलेक्टर मनीषसिंह ने एरोड्रम थाने में की थी। इस मामले में ईओडब्ल्यू ने 7 साल तक जांच की थी। उसके बाद 28 दिसंबर 2011 को निम्नश्रेणी लिपिक ओमप्रकाश कानूनगो सहित 23 फर्मों के प्रोपरायटर के खिलाफ मुख्य चालान पेश किया था। । मामले में 23 व्यापारी, पांच मंडी कर्मचारी सहित 28 आरोपियों के खिलाफ पूर्व में चालान पेश किया था ।
तत्पश्चात 28 दिसंबर 2013 को तत्कालीन मण्डी प्रांगण प्रभारी सतीश परेता, सहायक उपनिरीक्षक दिनेश शर्मा, सहायक उप निरीक्षक सरदारसिंह राठौर, मण्डी सहायक उप निरीक्षक दिलीप रायकवार व दैनिक वेतन भोगी संतोष पटेल के खिलाफ धोखाधड़ी आदि जुर्म की धाराओं में चालान पेश किया था किंतु दाहिमा के खिलाफ लंबे समय तक चालान पेश करने में कोताही बरती जा रही थी। जबकि ईओडब्ल्यू ने पांच बिंदुओं पर उसे पहले ही दोषी माना था। इसके बाद तीन वर्ष पहले जज जयप्रकाशसिंह के समक्ष भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दाहिमा के खिलाफ पूरक चालान पेश किया गया था। मामले में ताजा सुनवाई पर दाहिमा की ओर से उसके अधिवक्ता ने उपस्थित होकर तीन सप्ताह तक उपस्थिति से छूट के लिए अदालत के समक्ष आवेदन दिया था लेकिन कोर्ट ने माना कि आरोपी अभी तक कोर्ट में पेश नहीं हुआ है। पांच साल पुराना प्रकरण होने के बाद भी आरोपी समन तामिल नहीं होने दे रहा है। ऐसे में उसका गिरफ्तारी वारंट जारी कर 19 फरवरी को अगली सुनवाई पर कोर्ट में उपस्थित रहने के आदेश ईओडब्ल्यू के एसपी को दिए है।
मुख्य चालान ऐतिहासिक था – खास बात यह है कि वर्ष 2011 में लिपिक कानूनगो सहित 23 व्यापारिक फर्मों के खिलाफ पेश मुख्य चालान ऐतिहासिक था वह करीब डेढ़ लाख पन्नों का था। मामले में व्यापारी जगदीश तिवारी, दिलीप अग्रवाल, आशीष गुप्ता, अनिल मित्तल, आनंद गुप्ता, अमित गर्ग, रवि काकाणी, मनीष गोयल, चंद्रशेखर अग्रवाल, आवेश गर्ग, हरीश गलकर, अश्विन गोयल, सौरभ मंगल, आनंदकुमार जैन, कैलाशचंद्र, मुरारीलाल अग्रवाल, संजय गर्ग, बाबूलाल अग्रवाल, श्यामसुंदर अग्रवाल, विजयकुमार अग्रवाल व सचिन मंगल भी आरोपी थे जबकि इस मामले में दो व्यापारी फर्म के संचालक संजय पिता मनसुखभाई मेहता व प्रदीप पिता शिवस्वरूप जैन अभी तक फरार है। एक-दूसरे की पहचान कर ऐसे लगाया करोड़ों का चूना-मंडी सचिव रहते मनीषसिंह ने मामले में वर्ष २००४ में एरोड्रम थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी जिसके बाद ईओडब्ल्यू ने ७ साल तक जांच की और फिर मुख्य चालान पेश किया था। कुल २३ फर्मों के द्वारा बनाए गए लाइसेंसों में मंडी के नियमों की जमकर अनदेखी की गई थी और बिना मंडी शुल्क जमा किए ही इन फर्मों को अधिकारियों ने बाले-बाले लाइसेंस जारी कर दिए। खास बात यह रही कि आरोपियों ने एक-दूसरे की पहचान पेश की और संगठित रूप से साजिश रच कर एक-दूसरे के लाइसेंस बनवाने में मदद की, जब मंडी ने लाइसेंस में दर्ज पतों पर मंडी शुल्क वसूली हेतु नोटिस भेजे तो वे मैदानी हकीकत का पता चला और मालूम पड़ा कि इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। अधिकारियों/कर्मचारियों व व्यापारियों की मिली भगत से नियमों की अनदेखी कर किए गए इस अपराध से आठ करोड़ से अधिक के राजस्व की चोरी की गई और उन्हें इतनी ही राशि का गैर कानूनी तरीके से फायदा पहुंचाया गया।