गर्भ में इतिहास: कलमोड़ा में माताजी के ओटले के नीचे एक हजार साल पुराना भग्न शिव मंदिर मिला

गर्भ में इतिहास: कलमोड़ा में माताजी के ओटले के नीचे एक हजार साल पुराना भग्न शिव मंदिर मिला


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उज्जैन5 घंटे पहले

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खुदाई में निकला मंदिर का आधा हिस्सा।

  • अब 32 किमी दूर निकला मंदिर

उज्जैन से करीब 32 किमी दूर ग्राम कलमोड़ा के बल्ड़े के नीचे पुरातत्व विशेषज्ञों ने माताजी के ओटले के नीचे से एक हजार साल पुराना शिव मंदिर खोज निकाला। मंदिर का आधा हिस्सा सलामत मिला है। मंदिर के ऊपरी हिस्से के भग्नावशेष व मूर्तियां जमीन से निकाली गई हैं। इसके पास ही एक और ओटला है, वहां भी मंदिर होने की संभावना है।

कलमोड़ा ग्राम के बाहरी हिस्से में एक छोटी पहाड़ी (बल्ड़ा) है। इसके नीचे ही माताजी का ओटला है। पास में ही एक और ओटला है जहां हनुमानजी विराजित हैं। दोनों के बीच बरसाती नाला बहता है। गांव के भीतर भी माताजी का प्राचीन मंदिर है। गांव के निवासी दिलीपसिंह बताते हैं कि इन प्राचीन स्थानों को लेकर हमेशा जिज्ञासा रही। इसलिए पुरातत्वविदों से पहले भी संपर्क किया गया था।

ग्रामीणों से लेते हैं प्राचीन स्थलों की जानकारी, उसी में मिला सुराग

  • डॉ. विश्री वाकणकर शोध संस्थान द्वारा ग्रामीण इलाकों में पुरातत्व स्थलों की खोज के लिए अभियान चलाया जा रहा है। संस्थान के लोग गांवों में जाकर गांववासियों से प्राचीन स्थलों की जानकारी लेते हैं और वहां सर्वे करते हैं। संस्थान के रिसर्च ऑफिसर डॉ. ध्रुवेंद्रसिंह जोधा इस गांव में पहुंचे तो उन्हें ग्रामीणों ने इन स्थानों की जानकारी दी।
  • जब वे ओटले पर गए तो ओटले के नीचे मंदिर के अवशेष की संभावना दिखी।
  • पुरातत्व विभाग के आयुक्त शिवशेखर शुक्ला के निर्देशन में संस्थान निदेशक डॉ. गीता सभरवाल, पुराविद् डॉ. राजेश कुमार, शोध छात्र हितेश जोझा ने यहां डॉ. जोधा के साथ 1 फरवरी से काम शुरू कर दिया।

विशेषज्ञों ने खुदाई कर मंदिर के अवशेष निकाले, परिसर में एक और मंदिर होने की संभावना
ओटले के आसपास की जब मिट्टी हटाई गई तो नीचे मंदिर का जगती (नीचे का हिस्सा) निकल आया। आसपास की खुदाई में मूर्तियां व मंदिर के अन्य अवशेष निकले। यहां लगातार उत्खनन किया जा रहा है। डॉ. जोधा का कहना है कि उत्खनन में यदि मंदिर के सभी हिस्से मिल जाते हैं तो पूरे मंदिर को फिर से खड़ा किया जा सकता है।

शिव, ब्रह्मा, विष्णु, हरि-हर की प्रतिमाएं
खुदाई में ब्रह्मा की तीन मुख वाली भग्न प्रतिमा जिसके एक हाथ में पुस्तक और दूसरे हाथ में श्रुवा है, मिली है। शिव की मूर्ति जटायुक्त मुकुट, कुंडल, तीन लड़ी हार से अलंकृत है। एक प्रतिमा में शिव और विष्णु हैं। मूर्तियों में शिवलिंग, नंदी भी मिले हैं। मंदिर के भग्नावशेषों में आमलक, शिखर कलश, जगती, मंजरी, कपोती, लतावल्लभी, कीर्तिमुख, मगर मुख व अन्य हिस्से हैं। मंदिर की चौड़ाई 4.5 मीटर तथा लंबाई 8.15 मीटर के करीब है। इससे अनुमान है कि मंदिर करीब 15 मीटर ऊंचा रहा होगा।

लोहे के क्लाम्स से कसा था मंदिर
पुरातत्व विशेषज्ञों को खुदाई में लोहे के क्लाम भी मिले। अनुमान है कि पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने में लोहे के क्लाम्स का उपयोग किया गया था। खोजकर्ताओं का कहना है कि यदि मंदिर के सभी हिस्से मिल जाते हैं तो मंदिर को फिर से खड़ा किया जा सकता है।

खुदाई में 70 फीसदी हिस्से मिल गए तो मंदिर बन सकेगा
डॉ. जोधा के अनुसार अब इन सभी हिस्सों की ड्राइंग बनेगी, उनका एनालिसिस किया जाएगा। इंजीनियर सर्वे करेंगे। यदि मंदिर के 70 फीसदी हिस्से मिल गए तो मंदिर को फिर से बनाने की संभावना रहेगी। ग्रामीणों की मदद से मंदिर फिर से बन सकता है। मंदिर के पास बरसाती नाले के उस पार एक और ओटला है। उसके नीचे भी मंदिर होने की संभावना है। इसका काम पूरा होने के बाद दूसरे मंदिर पर भी काम हो सकता है। इसी तरह गांव के भीतर भी माताजी का मंदिर है, वहां भी उत्खनन में प्राचीन मंदिर मिल सकता है।

परमारकालीन 11वीं शताब्दी का शिव मंदिर
डॉ. जोधा ने बताया प्राथमिक अनुमान है कि यह मंदिर 11वीं शताब्दी का यानी एक हजार साल पुराना परमारकालीन है। मंदिर बेसाल्ट पत्थरों से बना है। यह पत्थर पास के ही बल्ड़े से लिए गए हैं। कुछ ग्रेनाइट पत्थरों का भी उपयोग किया था। यहां से उस समय के तांबे और मिट्टी के पात्र भी मिले हैं, जिनमें मटकियां, दीपक, धूप पात्र हैं।

200 साल तक मंदिरों की मुहिम चली थी
मप्र विक्रमादित्य शोध पीठ के पूर्व निदेशक डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित के अनुसार मालवा में राजाभोज व उनके उत्तराधिकारियों (परमार काल) के समय 200 साल तक मंदिर बनवाने की मुहिम चली थी। विक्रमादित्य काल के बाद परमारों ने मंदिर बनवाए। इसलिए मालवा के गांव-गांव में ऐसे प्राचीन मंदिर हैं।



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