Opinion: यहां व्यंग्य पर नाटक करना मना है…

Opinion: यहां व्यंग्य पर नाटक करना मना है…


धर्म और संस्कृति को कला, संस्कृति और कलाकार से ही ख़तरा है. लिहाज़ा मध्यप्रदेश के छतरपुर में कुछ लोगों ने जन नाट्य संघ के राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम को धमकी देकर स्थगित करवा दिया. वैसे अब ऐसी बातों पर और गुंडागर्दी पर आपको-हमको कोई हैरानी नहीं होती है. ये तो अब रोज़ाना की खबरें हो गई हैं. उंगलियों पर गिने जाने वाले कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदार इप्टा के चतुर्थ राष्ट्रीय सम्मेलन का इसलिए विरोध करते हैं क्योंकि इस कार्यक्रम में ‘जाति ही पूछो साधौ की’ और ‘बेशर्ममेव जयते’ जैसे नाटक का मंचन होना था.

अब अक्लमंद लोगों ने नाटकों के नाम सुनकर ही ये अंदाज़ा लगा लिया कि इनसे धर्म खतरे में आ जाएगा. तेज़ दिमाग के लोगों को लगा कि जाति ही पूछो साधु में, साधु की जाति पूछी जा रा रही है. अब धर्म के ठेकेदारों की परेशानी ये थी कि भई आप लोग कौन होते हैं साधु की जाति पूछने वाले? उन्हें शायद यह भी लगा कि ‘बेशर्ममेव जयते’ हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ है. बस फिर क्या था. उन्होंने इप्टा से कार्यक्रम की योजना पूछी. दिन तारीख़ जैसे ही पता चली, इन्हीं दो नाटकों के नाम से बौखलाकर पहुंच गए धमकी देने. अब इन मुट्ठी भर लोगों ने हज़ारों बार मंचित हो चुके नाटकों को एक बार पढ़ना या देखना भी ज़रूरी नहीं समझा. तो यहां कह सकते हैं कि अक्ल बड़ी या भैंस! कुछ संगठनों ने प्रशासन को बाकायदा कार्यक्रम रद्द करवाने के लिए ज्ञापन सौंपा और प्रशासनिक अधिकारी के सामने कार्यक्रम होने पर उग्र प्रदर्शन की धमकी दे डाली. अधिकारी ने मुस्कुराते हुए ज्ञापन भी ले लिया और अगले दिन मीडिया में खबर छप गई.

सवाल यह है कि क्या इप्टा को कार्यक्रम के लिए अनुमति प्रशासन के बजाए, इन ठेकेदारों से लेनी चाहिए थी? पुलिस प्रशासन ने तो हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि आप उनसे बात कर लीजिए और आपस में निपट लीजिए. मतलब जिसे सुरक्षा देनी है वो दर्शक दीर्घा में बैठ गया. ख़ैर मसला ये भी है कि क्या इस कार्यक्रम में ऐसा कुछ हो भी रहा था जिससे किसी धर्म और संस्कृति के रक्षकों को इतना उग्र रूप धारण करना पड़ा. हालांकि, कलेक्टर ने कार्यक्रम के दो दिन पहले ही कोरोना को लेकर नई गाइडलाइन्स जारी कर दीं, जिसके बाद आयोजकों को नए सिरे से सारी औपचारिकताएं करनी पड़तीं. लिहाज़ा कार्यक्रम को रद्द करने की बजाए फिलहाल टाल दिया गया है. इप्टा मध्यप्रदेश महासचिव शिवेंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘आयोजन की घोषणा के बाद से ही कार्यक्रम निशाने पर था. नाटकों को लेकर बार-बार विवाद खड़े किए जा रहे थे. जबकि, पिछले कई सालों से यह आयोजन हो रहा है. हैरानी की बात ये है कि जिन नाटकों का विरोध हुआ, वह हास्य और व्यंग्य हैं. अब ये बात समझ से परे है कि सिर्फ़ नाम सुनकर ही धमकियां मिलने लगीं. हमारी पूरी टीम पिछले दो महीने से इस आयोजन और अपने नाटक की तैयारी कर रही थी.’ शिवेंद्र कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कला संस्कृति से ही किसी को क्या आपत्ति हो सकती है. शुरू में लगा था कि इप्टा के नाम को लेकर आपत्ति है तो इप्टा का नाम आयोजन से हटा दिया गया. हम हैरान हैं कि सिर्फ़ नाम से ही कोई कैसे किसी नाटक को सही गलत ठहरा सकता है. चंडीगढ़ से लगभग 40 लोगों की टीम आ रही थी. साथ ही भोपाल से भी बड़ी टीम आ रही थी. ये नुकसान सिर्फ़ कला का ही नहीं देश का आर्थिक नुकसान भी है.

छतरपुर जैसे शहर में इस तरह का विरोध पहली बार हुआ है. शिवेंद्र कहते हैं कि ये हमारे शहर का मामला है. डरने से काम नहीं चलेगा क्योंकि हमें दूसरे शहर से आने वाले कलाकारों की सुरक्षा का ख्याल भी करना है. आगे आने वाले दिनों में शहर के लोगों से बात करके कार्यक्रम को दोबारा किया जाएगा.

जाति ही पूछौ साधौ के डायरेक्टर शांतनु पांडेय मध्यप्रदेश नाट्य एकेडमी के छात्र रहे हैं. फिलहाल मुंबई में थिएटर में मास्टर्स कर रहे हैं. एक छोटे से कस्बे से निकलकर शांतनु मुंबई पहुंचे. वे कोरोना काल में छतरपुर में हैं. शांतनु कहते हैं कि विजय तेदुंलकर के व्यंग्य पर आधारित नाटक के हज़ारों मंचन हो चुके हैं. उनके निर्देशन में छतरपुर और टीकमगढ़ में तीन मंचन हो चुके हैं. शांतनु कहते हैं कि विरोध करने वाले लोग चाहते हैं कि नाटक में व्यंग्य ना हो, प्रेम में प्रेम नहीं दिखाया जाए, शौर्य में वीर रस ना दर्शाया जाए. हमें स्थानीय कलाकारों के साथ मिलकर काम करने से रोका गया है. शहर में जितनी बार भी मंचन किया गया, दर्शकों का खूब प्यार मिला है. धर्म के नाम पर ये बवाल सस्ती लोकप्रियता हासिल करना ही है.

कार्यक्रम की तैयारी में लगे कलाकार इस आयोजन और विवाद से दुखी हैं लेकिन नाउम्मीद नहीं. देवेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि उन्हें कई तरह के फोन कॉल्स आईं जिसमें ये कहा गया कि छतरपुर में वामपंथी हमला होने वाला है. वे हंसते हुए कहते है कि सिर्फ़ नाम से पूरा नाटक बिना देखे ही इसका विरोध करने वाले तो अंतर्यामी हो गए.

जिस दूसरे नाटक को लेकर विरोध की बात आई वो भी एक व्यंग्य ही है. इस नाटक नाम है बेशर्ममेव जयते. बेशर्ममेव जयते, प्रेम जन्मेजय जी का लिखा व्यंग्य है, जो भोपाल के ग्रुप की ओर से किया जा रहा था. इसकी परिकल्पना और निर्देशन तरुण दत्त पाण्डेय का है. इस नाटक में समाज में फैली कुरीतियों, अराजकताओं, व्याभिचारों एवं भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया गया है. ‘बेशर्ममेव जयते’ चार कहानियों का जिसमें बेशर्मी, ये जो टेंशन है, मक्खी एवं जाना है पुलिसवालों के यहां एक बारात में, का कोलाज है. हर कहानी में दिखाया गया है कि समाज का हर वर्ग निर्वस्त्र घूम रहा है और ये आक्षेप लगा रहा है कि जो व्यक्ति उसे देख रहा है वह बेशर्म है. उसने सत्यमेव जयते के मायने बदल दिए. हालांकि इसका विरोध भी बिना स्क्रिप्ट पढ़े या नाटक देखे बिना किए जा रहा है. कार्यक्रम में कई और नाटक होने थे जिसमें फिल्मिश, ताज महल का टेंडर, खदेरूगंज का रुमाटिंक ड्रामा शामिल है. ये एक बेहतरीन व्यंग्य नाटकों का आयोजन होता. अफ़सोस शहर के लोग इस आयोजन से महरूम रह गए.भावनाएं, धर्म आहत होने के नाम पर इस तरह की गुंडागर्दी एक तरह से प्रायोजित हो गई है. आप किसी स्डेंड-अप कॉमेडियन के खिलाफ़ शिकायत कर दीजिए, उठाकर जेल भेज दिया जाएगा. हमें लगता है कि हमारा क्या, हम क्यों बोलें. लेकिन धीरे धीरे इस ज़द में तो सभी आएंगे. मुंह छुपाने से कुछ नहीं होगा. अगर आप बोलते हैं कि आपके लब आज़ाद हैं तो आपको वाकई बताना होगा कि आपके लब आज़ाद हैं. वरना ये एक पैटर्न बनता जा रहा है कि आंख बंद करके विरोध करते जाना. अगर वाकई इन तथाकथित धर्म के रक्षकों को संस्कृति की परवाह होती तो विरोध करने से पहले नाटक देख ही लेते. तब शायद ये विरोध कर ही नहीं पाते. उम्मीद है कि लोग ऐसी धमकी और गुंडागर्दी के खिलाफ़ खुलकर सामने आएंगे क्योंकि आज ये आयोजन कहीं हैं, कल कहीं और होगा. आज निशाने पर कोई और है, कल कोई और होगा. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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