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रतलाम6 मिनट पहले
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यदि नरक गति की यात्रा नहीं करना है तो समकित यात्री बनना ही पड़ेगा। यदि समकित बनना है तो समकित यात्रा करनी ही होगी ये जीव आत्मा अनादिकाल से निगोद में रही है, मिथ्यात्व और नित्य निगोद से अपनी यात्रा शुरू हुई अव्यवहारिक राशि में अनन्त समय हमने व्यतीत किया। अकाम निर्जरा करते हुए हम व्हवहार राशि में पहुंचते हैं।
यथा निवर्ति कर्म भवी जीव मोक्ष में जाएंगे, लेकिन सारे भवी जीव मोक्ष में नही जाएंगे वे ही जीव मोक्ष में जाएंगे तो समकित यात्री बनेंगे। जब तक मिथ्यात्व अवस्था रहती है तब तक समकित यात्री नहीं बन सकते हैं। मिथ्यात्व में जीव पाप करता रहता है उस पाप से कर्म का बंधन बांधता रहता है, कर्मों की सजा प्राप्त करता रहता है और नए पाप भी लगातार करता रहता है, इस प्रकार यह साइकिल चलती रहती है।
यह बात आगमज्ञाता डॉ. समकित मुनि जी मसा ने कही। नीमचौक स्थानक में धर्मसभा में उन्होंने कहा पाप की मिथ्यात्व से गहरी दोस्ती है और सम्यक्त्व मोक्ष का पासपोर्ट है। इस आत्मा का मिथ्यात्व से रिश्ता अनादिकाल से चला आ रहा है। यदि समकित यात्री बनने की तैयारी करते हैं, तो पाप से रिश्ता कमजोर हो जाता है और मोक्ष का रिश्ता जुड़ जाता है।
मिथ्यात्व की यात्रा छीना झपटी की यात्रा है और समकित की यात्रा निवर्ति की यात्रा है । समकित यात्रा में पाप छूटता नहीं है, लेकिन पाप के प्रति आकर्षण कम हो जाता है । पाप करने पर मन में अपराधबोध होता है, जबकि मिथ्यात्व अवस्था में पाप करने के बाद जीव खुश होता है। यदि घर में टॉप क्लास का माहौल चाहिए तो थर्ड क्लास का व्यवहार छोड़ना होगा, छोटी छोटी गलतियों को इग्नोर करना गुण को ग्रहण करना यही समकित यात्रा की पहली सीढ़ी है। समकित यात्रा पर आधारित यह 3 दिनी प्रवचन माला 16 व 17 मार्च को सुबह 9 से 10 तक जारी रहेगी। 18 से 21 मार्च तक श्रवण कुमार चारित्र पर आधारित प्रवचन माला होगी।