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गुना4 घंटे पहले
सकतपुर में गांव में कुछ बच्चे सुबह क्रिकेट खेलते नजर आए।
गांवों में जिन दालानों पर रौनक हुआ करती थी, वह अब सुनसान पड़ी हैं। जिन चबूतरों पर बैठकर लोग गप्पे लगाया करते थे, वहां अब कोई नहीं दिखता। जिन मंदिरों में पेड़ के नीचे दिन भर लोगों का हुजूम लगा रहता था, वे वीरान नजर आते हैं। कोरोना ने गांव की जीवनशैली को बदल दिया है। एक समय जहां लोग एक – दूसरे से बात किए बिना नहीं रहते थे। अब कोरोना का खौफ ऐसा है कि कोई घर से निकलने की सोचते भी नहीं।
सोमवार और मंगलवार को भास्कर की टीम ने शहर से सटे दो गांवों का जायजा लिया। टीम ने सकतपुर और गढ़ा गांव पहुंचकर वहां के हालातों को देखा। सकतपुर गांव शहर से सटा होने के बाद भी कोरोना से अछूता रहा है। इसके पीछे यहां के लोगों की जीवनशैली है। टीम जब गांव में पहुंची, तो गांव की अधिकतर सड़कें सुनसान दिखीं। गांव के बाहर बने छोटे से मैदान में कुछ बच्चे जरूर क्रिकेट खेलते नजर आए। बच्चों के लिए समय निकलने का यही एक जरिया है।
वहीँ, गांव के दूसरे छोर पर कच्ची गुमठीनुमा झोपड़ी में कुछ बुजुर्ग और 2-3 लोग बैठे दिखे। इनमें से किसी ने भी मास्क नहीं पहना था। इनसे जब कोरोना को लेकर पूछा गया, तो इनका कहना था, गांव में अभी तक कोरोना का केस नहीं आया है। इसके पीछे यहां के लोगों की दिनचर्या है। यहां लोग सुबह से उठकर मेहनत करने में लग जाते हैं। चाहे तेज धूप हो, गर्मी हो लोग अपने खेतों पर काम करते हैं। वहीँ, गांव भी खुला है। आबादी घनी नहीं है। इस कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन वैसे ही हो जाता है।
यहां बैठे माधोलाल लोधा ने बताया, हम लोग फ्रिज का पानी नहीं पीते। न यहां पंखे की हवा है। टाइम पास करने के लिए कुछ लोगों के साथ बातचीत कर लेते हैं। पेपर वगैरह पढ़ लेते हैं। जैसे ही, 45 वर्ष से ऊपर के लोगों को वैक्सीन लगनी शुरू हुई। मैंने पत्नी के साथ जाकर टीका लगवा लिया। इसी गांव में मंदिर और स्कूल के पास सन्नाटा पसरा था। कुछ बच्चे बाद हैंडपंप पर समय व्यतीत करते नजर आए।
गढ़ा गांव में भी पसरा सन्नाटा
इसके बाद टीम शहर से 10 किमी दूर ग्राम गढ़ा में पहुंची। यहां लंबी-लंबी दलाने बनी हैं, लेकिन इन पर इस समय सन्नाटा है। गांव में कुछ केस कोरोना के आए हैं। यहां से कई लोग मंडी में सब्जी बेचने पहुंचते हैं। रोज सुबह आधा दर्जन ग्रामीण खेतों से सब्जी लेकर पहुंचते हैं। यहां के लोग मास्क को लेकर थोड़े जागरूक दिखे। हालांकि गांव वाले पॉजिटिव व्यक्ति के परिवार के प्रति सहानुभूति रखते हैं। खुद भी सावधानी बरत रहे हैं। ग्रामीण समय गुजरने के लिए घरों में ही कुछ न कुछ करते रहते हैं।