रॉबिन हुड से शेडो सरदार कैसे बने ददुआ डाकू, ऐसी कहानी सुनकर आपको यकीन नहीं होगा

रॉबिन हुड से शेडो सरदार कैसे बने ददुआ डाकू, ऐसी कहानी सुनकर आपको यकीन नहीं होगा


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Dadua Bandit True Story: बुंदेलखंड और चंबल का खौफ, ददुआ पिता की हत्या से बने डकैत की दास्तां, इंसानियत व न्याय की लकीरों के बीच लिखी एक असली कहानी.

हाइलाइट्स

  • ददुआ का असली नाम शिवकुमार पटेल था.
  • पिता की हत्या ने शिवकुमार को डकैत बना दिया.
  • 2007 में पुलिस मुठभेड़ में ददुआ का अंत हुआ.

शिवांक द्विवेदी , सतना : मई के अंत और जून के शुरुआती दिनों में एक स्थानीय घटना ने फिर से उन दिनों की यादें ताजा कर दीं जब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीहड़ों में दहशत का दूसरा नाम हुआ करता था. उन दिनों चित्रकूट के बीहड़ से निकलकर पूरे बुंदेलखंड और चंबल क्षेत्र में खौफ का पर्याय बना ददुआ आज भी चर्चाओं में ज़िंदा है.

पिता की मौत बनी दस्यु बनने की वजह

स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों के अनुसार ददुआ का असली नाम शिवकुमार पटेल था और उसका जन्म उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के देवकली गांव में हुआ था. एक समय जब उनके पिता का रसूखदारों से जमीन विवाद हुआ तो कथित तौर पर उन रसूखदारों ने ददुआ के पिता की बेरहमी से हत्या कर दी. इस दर्दनाक घटना ने शिवकुमार को बदल दिया. बदले की आग में जलता हुआ वह बीहड़ों की ओर चला गया और यहीं से शुरू हुआ ददुआ का डकैत बनने का सफर.

डकैत से दस्यु सरदार तक का सफर

1980 और 1990 के दशकों में ददुआ ने बुंदेलखंड और चंबल में अपना खौफ जमाया. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक उस पर करीब 250 अपहरण, लूट और हत्या के मामले दर्ज थे. लेकिन ग्रामीणों की नजर में वह सिर्फ एक अपराधी नहीं बल्कि गरीबों का मसीहा था. वह अमीरों से लूटता था और गरीबों में बांटता था. यही वजह है कि उसे बीहड़ों का रॉबिनहुड भी कहा जाने लगा.

राजनीति में भी थी गहरी पकड़

लोकल 18 से बातचीत में स्थानीय निवासी एस.के. द्विवेदी बताते हैं कि उस समय ददुआ का खौफ ऐसा था कि उसका नाम सुनकर ही लोग कांप उठते थे. कहा जाता है कि ददुआ के इशारे पर यूपी और एमपी में तकरीबन 20 विधायकों तक की राजनीति तय होती थी. उसकी पकड़ राजनीति में इतनी मजबूत थी कि नेताओं को भी उसके आगे झुकना पड़ता था.

बीहड़ में भाईचारा और हथियारों की ताकत

ग्रामीणों के बीच यह भी माना जाता है कि ददुआ के पास एक बड़ी फौज थी और हथियारों का भारी जखीरा. बीहड़ के दूसरे कुख्यात डकैत प्रकाश टिकरिया से उसका गहरा रिश्ता था. कुछ लोगों का मानना है कि प्रकाश टिकरिया ही ददुआ का गुरु था उसी की गैंग में रह कर ददुआ ने डकैती की बारीकियां सीखी.

2007 में हुआ अंत, लेकिन कहानियां आज भी ज़िंदा

ददुआ का अंत 2007 में एक पुलिस मुठभेड़ में हुआ. लेकिन उसके किस्से आज भी बुंदेलखंड और सतना के जंगलों में सुनने को मिलते हैं. कहते हैं उसने कई लड़कियों की शादियां करवाईं और कई गरीब परिवारों की मदद की. यह दोहरी छवि, अपराधी और मसीहा उसे आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित रखती है.

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