कोटा कप्तान कहे गए साउथ अफ्रीका के बावुमा, झेला नस्लवाद और खुद को किया साबित

कोटा कप्तान कहे गए साउथ अफ्रीका के बावुमा, झेला नस्लवाद और खुद को किया साबित


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Temba Bavuma Story: दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत कप्तान टेम्बा बावुमा, दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत क्रिकेट कप्तान, ने विश्व टेस्ट चैंपियनशिप जीतकर इतिहास रचा. नस्लवाद का सामना करते हुए उन्होंने अपनी काबि…और पढ़ें

टेम्बा बावुमा ने विश्व टेस्ट चैंपियनशिप जीतकर इतिहास रचा.

हाइलाइट्स

  • टेम्बा बावुमा दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत क्रिकेट कप्तान बने
  • बावुमा ने नस्लवाद का सामना कर अपनी काबिलियत साबित की
  • दक्षिण अफ्रीका ने बावुमा की कप्तानी में विश्व टेस्ट चैंपियनशिप जीती

Temba Bavuma Story: देश के पहले अश्वेत क्रिकेट कप्तान टेम्बा बावुमा ने एक ऐसा इतिहास रच दिया है कि आने वाले दिनों में दक्षिण अफ्रीका के बच्चों को उनकी कहानी सुनाई जाएगी. टेम्बा बावुमा के नाम का मतलब उनकी मूल भाषा खोसा में ‘आशा’ है. 5 फुट 4 इंच कद वाले क्रिकेट के इस सुपर हीरो के लिए इतना उपयुक्त नाम किसी और ने नहीं बल्कि भविष्यवक्ता ने ही सुझाया होगा. कभी रंगभेद जैसी सबसे अमानवीय प्रथा से जूझ रहे देश के लिए टेम्बा बावुमा का पहली बड़ी आईसीसी ट्रॉफी के साथ घर लौटना बहुत मायने रखता है. लॉर्ड्स के मैदान पर नीले आसमान के नीचे 84वें ओवर की चौथी गेंद पर काइल वेरिन ने मिशेल स्टार्क की गेंद को प्वाइंट और कवर के बीच से ड्राइव करके वह रन बनाया जिसने दक्षिण अफ्रीका को विश्व टेस्ट चैंपियन बना दिया. दक्षिण अफ्रीका ने 282 रनों के लक्ष्य को हासिल कर गत चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को पांच विकेट से हरा दिया.

दक्षिण अफ्रीका ने इससे पहले एक बार 1998 में चैंपियंस ट्रॉफी खिताब जीता था. तब इसे आईसीसी नॉकआउट ट्रॉफी के रूप में जाना जाता था. उसे दो बार टेस्ट में नंबर एक रैंक वाली टीम का ताज पहनाया गया. लेकिन दक्षिण अफ्रीकी टीम की कोई भी उपलब्धि इससे महत्वपूर्ण नहीं हो सकती. टेस्ट चैंपियनशिप गदा को ऊपर उठाए हुए दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत कप्तान बावुमा के बारे में लोगों की राय अलग-अलग थी. वह देश में बदलाव के प्रतीक थे. उन्हें कोटा प्रणाली के बारे में हर नकारात्मक बात के प्रतीक के रूप में भी पेश किया गया. लेकिन इससे उनके हौसले कम नहीं हुए. 

झेला भेदभाव
टेम्बा बावुमा जैसे दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत खिलाड़ियों को रंगभेद के कारण काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा है. यह केवल उन तक ही सीमित नहीं है. रंगभेद के दौर में और उसके बाद भी कई अश्वेत खिलाड़ियों को उनके रंग के कारण क्रिकेट में अवसरों से वंचित किया गया. या उनके प्रदर्शन पर सवाल उठाए गए. टेम्बा बावुमा का संघर्ष इस बात का एक उदाहरण है कि रंगभेद के खात्मे के बाद भी अश्वेत खिलाड़ियों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा है. बावुमा को अक्सर एक ‘कोटा खिलाड़ी’ के रूप में देखा जाता रहा है. जिसका अर्थ है कि उनका चयन उनकी योग्यता के बजाय उनकी नस्ल के आधार पर किया गया है. यह धारणा उनके प्रदर्शन पर अनावश्यक दबाव डालती है और उनकी उपलब्धियों को कम करती है.

विश्व टेस्ट चैंपियनशिप गदा के साथ टेम्बा बावुमा.
अनावश्यक दबाव
अश्वेत खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर हमेशा कड़ी नजर रखी जाती है और उन्हें गोरे खिलाड़ियों की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ता है. टेम्बा बावुमा के शुरुआती करियर में एकमात्र अश्वेत अफ्रीकी बल्लेबाज के रूप में शतक लगाने के बावजूद उन पर ‘कोटा खिलाड़ी ’ होने का लेबल लगा रहा. हाल ही में टेम्बा बावुमा को एसए 20 (दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख टी20 लीग) की नीलामी में दो बार नजरअंदाज किया गया. जिससे यह सवाल उठा कि क्या यह उनके प्रदर्शन से ज्यादा नस्लीय पूर्वाग्रह के कारण था. दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत अफ्रीकी कप्तान के रूप में टेम्बा बावुमा पर सिर्फ क्रिकेट मैदान पर प्रदर्शन का ही नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का भी भारी दबाव रहा है. बावुमा जैसे खिलाड़ियों को अपनी काबिलियत साबित करने के लिए अक्सर दूसरों से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है.

लैंगा का चैंपियन लड़का
टेम्बा बावुमा के क्रिकेट के सबसे कठिन प्रारूप में खिताब जीतने से लैंगा में पले-बढ़े युवा क्रिकेटरों की महत्वाकांक्षाएं भी आसमान छू जाएंगी. लैंगा केप टाउन के पास एक अश्वेत बस्ती है, जहां टेम्बा बावुमा का पालन-पोषण हुआ था. बहुत पहले नहीं यह एक ऐसी बस्ती थी, जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं. 1990 में नेल्सन मंडेला की जेल से रिहाई और उसके बाद 1994 में बहु-नस्लीय चुनाव के बाद लैंगा में बदलाव आया. माचिस की डिब्बी वाली मिट्टी की झोपड़ियों वाली यह जगह अब ऊंची इमारतों से सजी है. जिनकी अधिकांश बालकनियों पर सैटेलाइट डिस्क लगी हुई हैं. लैंगा ने अपना अतीत नहीं भुलाया है, लेकिन निश्चित रूप से आगे बढ़ गया है. शार्पविले नरसंहार स्मारक ठीक उसी स्थान पर है जहां 1960 में पुलिस की गोलियों से 69 अश्वेत रंगभेद विरोधी प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी.

पहला बड़ा आईसीसी खिताब
टेम्बा बावुमा ने यह साबित कर दिया कि अश्वेत क्रिकेटर सिर्फ गोरे खिलाड़ियों को गेंदबाजी करने के लिए ही इस खेल को नहीं अपनाते. बावुमा ने दिखाया कि अश्वेत खिलाड़ी भी बल्लेबाजी कर सकते हैं. वह दक्षिण अफ्रीका के लिए टेस्ट शतक बनाने वाले पहले अश्वेत क्रिकेटर हैं. साथ ही उन्होंने अपना पहला बड़ा आईसीसी खिताब भी जीता. विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में दो अन्य अश्वेत क्रिकेटरों कैगिसो रबाडा और लुंगी एनगिडी ने भी शानदार प्रदर्शन किया. रबाडा ने दोनों पारियों में नौ विकेट लिए. लुंगी एनगिडी ने दूसरी पारी में धमाकेदार गेंदबाजी (तीन विकेट) कर दक्षिण अफ्रीका को खेल में वापस लाने का काम किया. भारतीय मूल के बाएं हाथ के स्पिनर केशव महाराज ने भी एक विकेट लिया. फाइनल में श्वेत क्रिकेटरों ने भी शानदार प्रदर्शन किया, जैसे कि एडन मार्करम, सीम-बॉलिंग ऑलराउंडर मार्को जेनसन, डेविड बेडिंघम और काइल वेरिन. इस जीत ने टेम्बा बावुमा का कद बढ़ा दिया. उन्होंने साबित कर दिया कि इस कहानी का अंत इससे अच्छा नहीं हो सकता था.

नहीं मिलते थे अवसर
रंगभेद ने दक्षिण अफ्रीका में क्रिकेट को नस्लीय आधार पर अलग कर दिया था. अश्वेत खिलाड़ियों को गोरे खिलाड़ियों के समान सुविधाएं, प्रशिक्षण और अवसर नहीं मिलते थे. उनके लिए राष्ट्रीय टीम में खेलना लगभग असंभव था, भले ही वे कितने भी प्रतिभाशाली हों. बेसिल डी’ओलिवेरा रंगभेद के कारण क्रिकेट में भेदभाव का सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक हैं. केप कलर्ड समुदाय से आने वाले डी’ओलिवेरा को 1968-69 में इंग्लैंड के दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए इंग्लिश टीम में शामिल करने पर एक बड़ा राजनीतिक और खेल विवाद खड़ा हो गया था. नस्लीय आधार पर उन्हें दक्षिण अफ्रीका की व्हाइट टेस्ट टीम में खेलने से रोक दिया गया था. उन्हें इंग्लैंड के लिए खेलने के लिए दक्षिण अफ्रीका छोड़ना पड़ा. भले ही रंगभेद औपचारिक रूप से समाप्त हो गया, लेकिन इसका प्रभाव क्रिकेट पर लंबे समय तक बना रहा. अश्वेत खिलाड़ियों को अभी भी ‘कोटा खिलाड़ी’ या ‘राजनीतिक रूप से चयन मजबूरी’ के रूप में देखा जाता था. जिससे उनके प्रदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता था.

क्या है कोटा प्रणाली
दक्षिणी अफ्रीकी क्रिकेट में कोटा प्रणाली (Quota System) एक ऐसी व्यवस्था है जिसे देश में रंगभेद के लंबे इतिहास के बाद नस्लीय समानता लाने और क्रिकेट में अश्वेत खिलाड़ियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है. दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय से रंगभेद की नीति चली आ रही थी, जिसके तहत अश्वेत लोगों के साथ भेदभाव किया जाता था. इसका असर क्रिकेट पर भी पड़ा, जहां मुख्य रूप से श्वेत खिलाड़ियों को ही मौका मिलता था. इस नीति के कारण दक्षिण अफ्रीका पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से 21 साल का बैन भी लगा था, जो 1991 में हटा. कोटा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीमों में सभी नस्लीय समूहों, विशेषकर अश्वेत और अफ्रीकी मूल के अश्वेत खिलाड़ियों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है. 2016 की नीति के अनुसार राष्ट्रीय टीम में किसी भी मैच के लिए प्लेइंग इलेवन में औसतन कम से कम छह अश्वेत खिलाड़ी होने अनिवार्य हैं. इन छह अश्वेत खिलाड़ियों में से कम से कम दो खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के अश्वेत होने चाहिए. यह नियम राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों स्तरों पर लागू होता है.

आज भी जारी है लड़ाई
दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत अफ्रीकी टेस्ट क्रिकेटर और सर्वकालिक तीसरे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले खिलाड़ी मखाया एन्टिनी को भी अपने करियर की शुरुआत में ‘कोटा खिलाड़ी’ के रूप में खारिज कर दिया गया था. उन्हें अपनी योग्यता साबित करने के लिए अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ा. इसी तरह एक और दिग्गज बल्लेबाज हाशिम अमला को भी अपने करियर की शुरुआत में चयन की मजबूरी के रूप में देखा गया था. जबकि वह अपनी प्रतिभा और लगातार प्रदर्शन से टीम में जगह बनाते थे. हर्शल गिब्स एक विस्फोटक सलामी बल्लेबाज थे, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से कई मैच जिताए. हालांकि उन्हें भी रंगभेद के बाद के युग में टीम के भीतर कुछ मुद्दों का सामना करना पड़ा. इन सभी खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से क्रिकेट की दुनिया में अपनी पहचान बनाई. लेकिन रंगभेद के काले साये ने उनके रास्ते में कई बाधाएं खड़ी कीं. टेम्बा बावुमा आज भी इस लड़ाई को जारी रखे हुए हैं. यह साबित करते हुए कि प्रतिभा और लीडरशिप का रंग से कोई लेना-देना नहीं है. 

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