खंडवा.मध्य प्रदेश का वह अनोखा हिस्सा, जिसकी पहचान किसी राजा, भाषा या पर्वत से नहीं, बल्कि एक पेड़ से जुड़ी है. जी हां, बात हो रही है निमाड़ क्षेत्र की. आपने इस क्षेत्र का नाम कई बार सुना होगा,लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘निमाड़’ नाम कहां से आया? न तो यह किसी भाषा से जुड़ा है, न किसी जातीय समूह से — बल्कि यह नाम नीम के पेड़ से निकला हुआ है. यह कहानी है एक पेड़ और एक पूरे इलाके के रिश्ते की, जो प्रकृति, इतिहास और संस्कृति के ताने-बाने से बुनी गई है.
निमाड़ क्षेत्र के निवासी लव जोशी बताते है कि निमाड़ क्षेत्र मध्य प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में फैला हुआ है. यह क्षेत्र सतपुड़ा और विंध्य की पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है और नर्मदा नदी इसके बीचोंबीच बहती है. प्राचीन समय में इस इलाके में नीम के पेड़ों की भरमार हुआ करती थी. घने जंगलों में जहां-तहां नीम के झाड़ लगे थे, और इन्हीं झाड़ियों के कारण इसे ‘नीम के झाड़ों का प्रदेश’ — यानी निमाड़ कहा जाने लगा. निमाड़ शब्द की जड़ है ”नीम” और ”आड़” — यानी नीम के पेड़ जहां तक फैले थे, वह क्षेत्र निमाड़ कहलाया.
पौराणिक और ऐतिहासिक उल्लेख
लव जोशी ने कई सालो पहले की बात बताई,महाभारत काल में इस क्षेत्र को सागर अनुपवासिनी के नाम से जाना जाता था. इसका अर्थ है — “वह भूमि जो नदियों के बहाव से घिरी हो और सागर तक फैली हो.” नर्मदा नदी का प्रवाह, जो अमरकंटक से शुरू होकर गुजरात के भरूच तक जाता है, इसी क्षेत्र को पार करता है.कालिदास की कृति रघुवंश में भी इस क्षेत्र का उल्लेख अनूप जनपद के रूप में किया गया है. अनूप का अर्थ होता है – “जहां पानी का बहाव हो, नदी-तालाबों से समृद्ध भूमि.” यह क्षेत्र नर्मदा और ताप्ती जैसी नदियों के किनारे बसा हुआ है और प्राचीन काल में इसे एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र माना गया.सातवाहन वंश की महारानी गौतमी बालश्री ने जो शिलालेख नासिक में स्थापित किए, उनमें भी ”अनुपदेश” नाम से इस क्षेत्र का उल्लेख किया गया है. इससे पता चलता है कि यह क्षेत्र न केवल प्राकृतिक दृष्टि से समृद्ध था, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अहम भूमिका निभाता था.
नीम के पेड़ न केवल इस क्षेत्र की पहचान थे, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा भी. गांवों में नीम के नीचे चौपालें लगती थीं, बच्चे खेलते थे और बुजुर्ग वहां बैठकर मौसम का अनुमान लगाते थे. नीम का दातुन, नीम की छाल, नीम की पत्तियों से बनी दवाएं — सबकुछ यहां के जनजीवन का हिस्सा रहा. आज भी यदि निमाड़ के किसी गांव में चले जाएं, तो वहां नीम के पेड़ों की छांव में बैठे बुजुर्ग मिल जाएंगे, जो कहेंगे — “ये इलाका नीम का है बेटा, तभी तो इसे निमाड़ कहा जाता है.”
निमाड़ की भौगोलिक सीमा और जिले
वर्तमान में निमाड़ को दो प्रमुख भागों में बांटा जाता है — पूर्वी निमाड़ और पश्चिमी निमाड़.
पूर्वी निमाड़ में खंडवा और बुरहानपुर जैसे जिले आते हैं.
पश्चिमी निमाड़ में खरगोन और बड़वानी जैसे जिले आते हैं.
निष्कर्ष
नर्मदा की गोद में बसा, नीम की छांव में पला यह क्षेत्र सिर्फ एक भूगोल नहीं, बल्कि एक जीता-जागता इतिहास है. निमाड़ कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि प्रकृति और परंपरा का मेल है. यह अनोखी कहानी हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी पेड़ भी इतिहास बना देते हैं — और नीम ने यही किया. तो अगली बार जब आप “निमाड़” शब्द सुनें, तो सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, एक पूरी परंपरा और प्रकृति की गूंज को याद कीजिए — जहां पेड़ों ने नाम दिया, और नाम ने पहचान.