आपने अक्सर सुना होगा “कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली!” जब दो चीज़ों या लोगों के बीच भारी फर्क बताना हो, तो ये कहावत मुंह से अपने-आप निकल जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस कहावत की जड़ क्या है? कौन थे राजा भोज और कौन था गंगू तेली?
इस कहावत का इस्तेमाल तो हम सब करते हैं, लेकिन इसकी असल कहानी और इतिहास बहुत ही दिलचस्प है, और इसका सीधा कनेक्शन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से है.
कैसे बनी कहावत?
इस कहावत में सबसे पहले बात होती है राजा भोज की. ये वही भोज हैं, जिनके नाम पर ही भोपाल शहर का नाम पड़ा. पहले इसे “भोजपाल” कहा जाता था. राजा भोज 11वीं सदी में मालवा के राजा थे. वो सिर्फ एक बहादुर योद्धा ही नहीं, बल्कि कला, विज्ञान और स्थापत्य में भी काफी आगे थे. उनके शासनकाल में मालवा (जिसकी राजधानी तब धार थी) ने काफी तरक्की की.
तो फिर कौन था गंगू तेली?
अब आते हैं “गंगू तेली” पर. लोगों को अक्सर लगता है कि ये कोई आम व्यक्ति या छोटी जाति से जुड़ा नाम है, लेकिन असल में गंगू और तेली दो अलग-अलग राजा थे.
गंगू, दरअसल कलचुरी वंश के राजा गांगेयदेव थे.
और तेली, चालुक्य वंश के राजा जयसिंह तैलंग थे.
इतिहासकारों की मानें तो ये दोनों राजा एक बार राजा भोज पर हमला करने के लिए एकजुट हो गए थे, लेकिन राजा भोज ने छोटी सी सेना के साथ इन दोनों को करारी शिकस्त दी. कहावत का मतलब सिर्फ मज़ाक नहीं, असल में है एक ऐतिहासिक जीत
जब राजा भोज ने गंगू और तैलंग जैसे दो बड़े राजाओं को हरा दिया, तो इस घटना को लोग मज़ाकिया और प्रतीकात्मक अंदाज़ में याद रखने लगे. यहीं से जन्म हुआ इस कहावत का “कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली“.
इसका मतलब था… एक तरफ वो जो ताकतवर, ज्ञानी और बहादुर है… और दूसरी ओर वो जो उसके सामने कहीं नहीं टिकता.
समय के साथ इस कहावत को लोकभाषा में थोड़ा तोड़-मरोड़ कर, कभी जाति से जोड़कर, तो कभी मज़ाक में इस्तेमाल किया जाने लगा. लेकिन असल में यह कहावत दो असली राजाओं की लड़ाई और हार-जीत की कहानी है.
आज भी जुबान पर ज़िंदा है ये कहावत
चाहे टीवी डिबेट हो या चाय की दुकान की बहस, ये कहावत आज भी हर जगह सुनाई देती है. लेकिन अब जब भी आप ये कहें “कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली“, तो याद रखिए, इसके पीछे एक हज़ार साल पुरानी ऐतिहासिक कहानी छिपी है, जो मध्य प्रदेश और खासकर भोपाल से गहराई से जुड़ी हुई है.