यहां जो भी आता है वो खाली नहीं जाता…2 दिन में 7 लाख भक्त पहुंचे दादाजी धाम, जानें खासियत

यहां जो भी आता है वो खाली नहीं जाता…2 दिन में 7 लाख भक्त पहुंचे दादाजी धाम, जानें खासियत


मध्य प्रदेश का खंडवा शहर इन दिनों सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि आस्था और सेवा का अद्भुत संगम बन चुका है. गुरु पूर्णिमा के मौके पर यहां दादाजी धूनीवाले की समाधि पर दो दिन में करीब 6 से 7 लाख श्रद्धालु पहुंचे. खास बात ये रही कि इन लाखों भक्तों की सेवा के लिए पूरा शहर खुद ‘सेवाग्राम‘ बन गया.

हर गली, हर मोड़ पर सेवा का भाव

गुरु पूर्णिमा से कुछ दिन पहले ही खंडवा पूरी तरह सज-धज कर तैयार हो गया था. हर चौराहे, हर गली, हर मंदिर के आसपास टेंट लगे हुए थे, जिनमें खाने-पीने से लेकर आराम करने तक की सुविधा थी. पूरा शहर तन-मन-धन से भक्तों की सेवा में जुटा रहा.

यहां तक कि 50 से 100 किलोमीटर दूर तक, खंडवा आने वाले रास्तों पर भी श्रद्धालुओं के लिए खाने-पीने के स्टॉल लगे थे. पूरी-सब्जी, हलवा, मालपुए, भजिए, समोसे, इडली-सांभर, जलेबी, ड्राई फ्रूट्स जो चाहो, सब श्रद्धा के साथ परोसा गया.

पाने वाले भी दादाजी, देने वाले भी दादाजी

दादाजी धूनीवाले की सेवा परंपरा 1930 से चल रही है, जब उन्होंने खंडवा में समाधि ली थी. उनके जीवन में सेवा, त्याग और ज्ञान की जो भावना थी, वही आज इस पूरे आयोजन में दिखाई देती है. दादाजी जहां भी रुकते थे, वहां भक्तों को रोट (मोटी रोटी) की प्रसादी मिलती थी, और आज भी ये परंपरा उसी श्रद्धा से निभाई जा रही है.

भक्तों कोसिर्फ रोट और भस्म मिलती है, बल्कि पंचामृत से अभिषेक कर प्रसादी दी जाती है, जिसमें दूध, दही, शहद, गंगाजल और नर्मदा जल होता है.

निशान यात्रा और संकीर्तन से गूंजा खंडवा

गुरु पूर्णिमा से एक पूर्णिमा पहले से ही कई श्रद्धालु महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के अन्य जिलों से निशान लेकर पैदल यात्रा पर निकल पड़ते हैं. रास्ते भर संकीर्तन करते हुए ये भक्त खंडवा पहुंचते हैं. ये कोई आम यात्रा नहीं, बल्कि श्रद्धा की मिसाल होती है.

दादाजी भक्त लव जोशी बताते हैं कि इस सेवा परंपरा को शुरू हुए 30-40 साल हो चुके हैं. अब तो हालत ये है कि लोग दूर-दराज से आकर भी सिर्फ सेवा में जुट जाते हैं.

सेवा में आगे बढ़ते शहरवासी और संस्थाएं

ऑटो चालक, ट्रक ड्राइवर, होटल वाले हर कोई अपनी तरह से सेवा में लगा रहता है. कोई मुफ्त में सवारी करवाता है, कोई भोजन बांटता है, कोई पानी पिलाता है. कई सेवाभावी संस्थाएं तो हेल्थ कैंप लगाकर मुफ्त इलाज तक करवा रही हैं.

नगर निगम, जिला प्रशासन और समाजसेवी संस्थाएं भी सफाई, ट्रैफिक, और पॉलीथिन रोकथाम जैसे कामों में दिन-रात लगे रहते हैं. टेंट और भोजन वितरण की तैयारी 1 महीने पहले ही शुरू हो जाती है.

आस्था और सेवा का जिंदा उदाहरण है खंडवा

गुरु पूर्णिमा पर जब बाकी जगहों पर सिर्फ पूजा-पाठ होता है, वहीं खंडवा में पूजा के साथ सेवा को भी धर्म माना जाता है. यहां हर व्यक्ति खुद को दादाजी का सेवक मानता है, और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत है.

दादाजी के भक्त कहते हैं कि यहां जो भी आता है, वो खाली नहीं जाता. सेवा करता है या सेवा पाता है, लेकिन दादाजी की कृपा से भर जाता है. खंडवा की ये सेवा परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बन चुकी है. गुरु पूर्णिमा के बहाने यहां जो प्रेम और अपनापन देखने को मिलता है, वो हर किसी के दिल को छू जाता है.



Source link