ग्वालियर के प्रिंस, केंद्रीय मंत्री…MP में सिंधिया की पकड़ पहले जैसी रही क्या?

ग्वालियर के प्रिंस, केंद्रीय मंत्री…MP में सिंधिया की पकड़ पहले जैसी रही क्या?


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ज्योतिरादित्य सिंधिया जब 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए, तो मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ. उनकी अगुवाई में हुए विधायकों के इस्तीफों ने भाजपा को सत्ता में वापसी दिलाई थी. उस समय ग्वालियर-चंबल…और पढ़ें

ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की प्रदेश में सक्रियता घटी है.

हाइलाइट्स

  • ज्‍योतिरादित्य सिंधिया की सक्रियता को लेकर सवाल
  • भाजपा में आने के बाद से बड़ा उलटफेर सामने आया
  • बीते कुछ सालों में प्रभाव के कमजोर होने की अटकलें
भोपाल. 2020 की राजनीतिक हलचल जिसने मध्य प्रदेश की सत्ता को झकझोर दिया, उसके केंद्र में एक नाम था—ज्योतिरादित्य सिंधिया. कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए सिंधिया ने अपने समर्थक 22 विधायकों के साथ इस्तीफा देकर तत्कालीन कमलनाथ सरकार को गिरा दिया. इसके बाद भाजपा फिर से सत्ता में आई और सिंधिया को केंद्र सरकार में मंत्री पद मिला. लेकिन अब जब तीन साल से ज़्यादा का समय बीत गया है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या सिंधिया की प्रदेश की राजनीति में अब भी पहले जैसी पकड़ है?

सिंधिया अब केंद्र में नागरिक उड्डयन और फिर संचार मंत्री जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं. संसद में उनकी मौजूदगी मजबूत रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान वे मध्य प्रदेश में बहुत सीमित दिखे. ग्वालियर-चंबल अंचल में कुछ सभाएं और रैलियां कीं, लेकिन पूरे राज्य में प्रभावशाली प्रचार से दूर रहे. पार्टी के भीतर कई जानकार मानते हैं कि सिंधिया की संगठन पर पकड़ पहले जितनी नहीं रही. भाजपा में उनका खेमा अब ‘सिंधिया समर्थक’ कहे जाने से बचता है, क्योंकि यह टैग संगठनात्मक रूप से कुछ नेताओं को असहज कर रहा है.

करीबी नेताओं की साइडलाइनिंग
पार्टी के भीतर सिंधिया के कई करीबी अब हाशिए पर नजर आ रहे हैं. कुछ को टिकट नहीं मिला, कुछ को मंत्रीमंडल विस्तार में मौका नहीं मिला. संगठन में भी ग्वालियर-चंबल से उनके प्रभाव वाले चेहरों को सीमित जिम्मेदारियां दी गई हैं. यह भी माना जा रहा है कि भाजपा का पुराना खेमा सिंधिया समर्थकों को पूरी तरह आत्मसात करने को लेकर अब भी आश्वस्त नहीं है.

BJP के लिए अब कितने जरूरी?
सवाल यही है-क्या भाजपा को अब भी सिंधिया की उतनी ही ज़रूरत है, जितनी 2020 में थी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में वे गेमचेंजर थे, लेकिन अब भाजपा सिंधिया के बजाय अपनी सांगठनिक ताकत और जातीय समीकरणों के दम पर ग्वालियर-चंबल अंचल में पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है. ऐसे में सिंधिया की भूमिका सीमित होती जा रही है.

कांग्रेस ने साधा निशाना, सिंधिया को सम्‍मान नहीं मिला
कांग्रेस नेता लगातार कह रहे हैं कि सिंधिया अब भाजपा में असहज हैं और उनकी राजनीतिक जमीन खिसक रही है. कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, “सिंधिया जी को भाजपा में वह सम्मान नहीं मिला, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे.” उन्‍होंने भाजपा को सत्‍ता में वापसी कराई, लेकिन अभी भी पार्टी ने उन्‍हें और उनकी टीम को पूरी तरह अपना नहीं माना है.

भविष्य के नेता, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता 
हालांकि सिंधिया एक बड़े नेता हैं और भाजपा उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती. उनकी छवि और संसदीय क्षमता पार्टी के लिए उपयोगी है, लेकिन उन्हें संगठन में फिर से गहराई से जुड़ने और अपने समर्थकों को सक्रिय करने की चुनौती है.

Sumit verma

सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्‍थानों में सजग जिम्‍मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें

सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्‍थानों में सजग जिम्‍मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प… और पढ़ें

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ग्वालियर के प्रिंस, केंद्रीय मंत्री…MP में सिंधिया की पकड़ पहले जैसी क्या?



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