कार्यक्रम को संबोधित करते गुना विधायक पन्नालाल शाक्य।
मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने गुरु वंदन कार्यक्रम का आयोजित किया। इसमें रिटायर शिक्षकों को विदाई दी। नए शिक्षकों का स्वागत किया। कार्यक्रम में गुना विधायक पन्नालाल शाक्य ने सरकारी शिक्षकों से कहा कि हम अपने बच्चों को तो प्राइवेट, कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाते
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रविवार को कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गुना विधायक पन्नालाल शाक्य ने कहा कि बुद्धिजीवियों के बीच में ज्ञान की बात करना ठीक नहीं है। आप सब बुद्धिजीवी हैं। पर बुद्धिजीवी जब मैं हो जाता है, तब फिर वह सारी मर्यादाएं टूट जाती हैं। इसका विचार करना, चिंतन करना।
अपन हंसी मजाक के लिए नहीं आए कि किसी की विदाई हो गई। किसी का सेवाकाल समाप्त हो गया इसलिए अपन लड्डू बाफले खा लेंगे, दाल पी लेंगे। ये जो चिंतन शिविर है, इसको बारीकी से समझने की कोशिश करना।
इस दौरान रिटायर शिक्षकों को सम्मानित किया गया।
विधायक बोले- ज्ञान का कोई मापदंड नहीं मतलब हमारे बच्चे तो जा रहे हैं प्राइवेट स्कूल में, कॉन्वेंट में और हम जिनको पढ़ा रहे हैं, उनको हम कितना दे रहे हैं। ज्ञान का कोई मापदंड नहीं है कि साहब 250 ग्राम लीटर में या 500 ग्राम लीटर में। ज्ञान का मापदंड नहीं है। वो तो 20- 25 साल बाद मालूम पड़ता है कि ज्ञान जो इसने प्राप्त किया है, वो किस स्तर का प्राप्त हुआ इसे।
हम अपने देश में ऐसे भी लोग देख चुके हैं, जिनके नाम लेने भर से ये समाज उथल पुथल हो जाता है। जैसे राम का चरित्र है, 14 वर्षों का वनवास सहर्ष स्वीकार किया और सिंहासन मिल गई राजा भरत के नाम। उनको तो सिंहासन मिल गई थी न, वो बैठ जाते। लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं, भैया को मनाने चलेंगे। ये समाज की गति कहां पहुंच गई।

कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षक।
बच्चों को ढ़ाई अक्षर प्रेम के पढ़ाएं विधायक ने कहा ये तो बंटवारे को बात हो गई। आज स्थिति और विकराल होती जा रही है। तो हमारा आज दायित्व बनता है, उस दायित्व का हम निर्वहन करें। हमारे बच्चे अगर प्राइवेट, कॉन्वेंट में पढ़ते हैं, तो हम जिन्हें पढ़ने जाते हैं, उन्हें भी कम से कम ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित हुए, इतना तो सिखा दो उन्हें। पर हम ढाई अक्षर भी नहीं दे पा रहे।
हम देश के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। आज जितनी टेक्नोलॉजी विकसित हुई है, विज्ञान जितना विकसित हुआ है, उसका ये परिणाम है कि भारत आज सशक्त रूप में विश्व के मंच पर खड़ा है। यह एक दो दिन की तपस्या नहीं है कि हाट बाजार से किसी व्यक्ति को उठा लाए और बोल दिया कि तू भी बैठ जा प्रधानमंत्री बन कर। एक हजार वर्षों की तपस्या है वो।
एक हजार वर्षों के पश्चात ऐसा महापुरुष आया है। और हम बिना कुछ समझे इसकी व्याख्या करने लगे हैं। यही तय नहीं हुआ अभी तक कि हम अपने बालक को शासकीय स्कूल में पढ़ाएं, और हम उस पर टिप्पणी कर रहे हैं।