चलती ट्रेन में 5 करोड़ की डकैती: न ट्रेन रुकी, न कोई गवाह था; सुरक्षा में तैनात 18 पुलिस वालों को भनक तक नहीं लगी – Madhya Pradesh News

चलती ट्रेन में 5 करोड़ की डकैती:  न ट्रेन रुकी, न कोई गवाह था; सुरक्षा में तैनात 18 पुलिस वालों को भनक तक नहीं लगी – Madhya Pradesh News


एक पैसेंजर ट्रेन के 2 डिब्बों में भारतीय रिजर्व बैंक के 342 करोड़ रुपए 226 अलग-अलग बॉक्स में रखे गए थे। दोनों डिब्बे पूरी तरह रिजर्व थे। सुरक्षा के लिए 18 पुलिस वाले तैनात थे। रात के अंधेरे में करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से ट्रेन चली जा रही

.

मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स में इस बार बात चर्चित ट्रेन डकैती की। जो तमिलनाडु में हुई, लेकिन उसके तार मध्यप्रदेश से जुड़े। वारदात ने अफसरों को भी हैरत में डाल दिया था। बदमाशों ने इतनी सफाई से काम को अंजाम दिया था कि पुलिस को मौके से कोई सुराग नहीं मिला। आखिर पुलिस कैसे आरोपियों तक पहुंची…

8 अगस्त 2016, रात 9 बजे, सेलम रेलवे स्टेशन, तमिलनाडु। पैसेंजर ट्रेन नंबर 11064 सेलम-चेन्नई एक्सप्रेस अपने तय समय पर रवाना होती है। मगर यह कोई आम रात नहीं थी। इस ट्रेन की दो बोगी सामान्य यात्रियों के लिए नहीं थी, बल्कि उन्हें रिजर्व रखा गया था।

बोगियों में देश के सबसे भरोसेमंद बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक के 342 करोड़ रुपए थे। बोगियों में कुल 226 लकड़ी के बॉक्स थे। हर बॉक्स में गड्डियों से भरे नोट, जो पुराने और कटे-फटे थे। ये चेन्नई के आरबीआई को लौटाए जाने वाले थे, ताकि बदले में नए नोट मिल सकें।

ट्रेन तमिलनाडु के सेलम रेलवे स्टेशन से चेन्नई के लिए रवाना हुई। ट्रेन 140 किलोमीटर का सफर तय कर रात 11 बजे विरुधाचलम पहुंचती है। यहां ट्रेन 1 घंटे रुकती है। क्योंकि यहीं से ट्रेन में डीजल इंजन बदला जा रहा था। उसकी जगह अब इलेक्ट्रिक इंजन लगना था। इंजन चेंज होता है और फिर ट्रेन आगे बढ़ जाती है।

अंधेरे में भी बोगी से बाहर रोशनी देख हुआ संदेह

5 घंटे बाद ट्रेन 9 अगस्त की सुबह 4 बजे तमिलनाडु के एग्मोर रेलवे स्टेशन पहुंचती है। ट्रेन के एग्मोर रेलवे स्टेशन पर पहुंचने पर पुलिस वालों ने सोचा कि बोगी का निरीक्षण किया जाए। इसी दौरान एक अफसर को बड़ा अजीब लगा। उसने देखा रात के अंधेरे में भी बोगी के अंदर बाहर से तेज रोशनी आ रही है। इसी के बाद जब एक रेलवे कर्मचारी को बोगी की छत पर भेजा गया तो पता चला छत में सेंध मारी जा चुकी है।

दरअसल, बोगी की लोहे की छत को किसी वेल्डिंग या गैस कटर मशीन से काटा गया था। चौड़ाई इतनी थी कि एक आदमी आसानी से उस सुराग से बोगी के अंदर आ-जा सकता था। जैसे ही सुरक्षाबलों को इस बात का एहसास हुआ। अचानक हड़कंप मच गया। इसी के बाद जब बोगी में रखे बॉक्स की तलाशी ली गई तो पता चला कि उस बोगी में रखे कुल 4 बॉक्स ऐसे थे। जिनके साथ छेड़छाड़ की गई है। इसमें से एक तो पूरी तरह खाली था। जबकि बाकी बॉक्स से कुछ नोट निकाले गए थे। बाद में सारे बॉक्स की गिनती की गई तो पता चला कि करीब 5 करोड़ रुपए गायब हैं।

चेन्नई पहुंचने से पहले ही गायब हो गए रुपए

पूरी ट्रेन की बोगी सील थी। बोगी के अंदर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। सभी गार्ड दूसरी बोगी में थे, जिसमें बाकी बॉक्स रखे थे। इतनी सटीक प्लानिंग, ऐसा जोखिम भरा तरीका, और वो भी हाई सिक्योरिटी ट्रेन में ये कोई साधारण चोर नहीं कर सकता था।

अब सवाल ये था कि आखिर चलती ट्रेन में डाका कैसे पड़ा? कहां पर पड़ा? इस तरह डाका डालने वाले वो शातिर लोग कौन हैं?

इस ट्रेन रॉबरी ने सभी को सन्न कर दिया था, क्योंकि चलती ट्रेन के अंदर छत काटकर बोगी में घुसना फिर रुपए निकाल कर ले जाना कोई आसान काम नहीं था। इसमें खतरा तो था ही साथ ही इस काम में वक्त भी बहुत लगना था।

इन तीनों बैंकों ने ये रुपए भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में लौटाने के लिए दिए थे। ताकि पुराने नोटों की जगह नए नोट मिल सके। इन सभी रुपयों को चेन्नई में भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में पहुंचाना था।

कब और कैसे डाला डाका?

सेलम से विरुधाचलम तक का 140 किलोमीटर का रास्ता ट्रेन डीजल इंजन से तय करती है, क्योंकि ये हिस्सा इलेक्ट्रिफाइड नहीं है। यानी ट्रेन के ऊपर हाई वोल्टेज वायर नहीं होते, जिससे बोगी की छत पर चढ़ना मुमकिन है।

इस रूट पर ट्रेनें इलेक्ट्रिक इंजन से नहीं चलती थी। जबकि इसके आगे का रूट विरुधाचलम से चेन्नई तक का रूट इलेक्ट्रिफाइड हो जाता है। यानी तब ट्रेनें 25 हजार वॉल्ट के करंट से दौड़ती हैं। ऐसे में ट्रेन के ऊपर चढ़ पाना संभव ही नहीं है।

पुलिस का मानना था कि शायद लुटेरे पहले से ट्रेन की छत पर सवार हो गए थे। संभवतः ट्रेन रवाना होने से ठीक पहले या फिर किसी छोटे स्टेशन पर धीमी स्पीड के वक्त। उनके पास कटिंग गैस मशीन थी, जिससे उन्होंने लोहे की छत में छेद किया। इस छेद से एक-एक कर लुटेरे अंदर घुसे, रात के अंधेरे और बोगी के सील होने का फायदा उठाया और अपनी मर्जी से चार बॉक्स में से नोट निकाले। हर चीज इतनी सफाई से की गई थी कि ट्रेन के अगले स्टेशन तक किसी को भनक नहीं लगी।

एआई जनरेटेड विजुअल्स।

एआई जनरेटेड विजुअल्स।

जांच की उलझन: पुलिस की पहली हार

पहले मामला रेलवे पुलिस के पास गया। फिर तमिलनाडु लोकल पुलिस ने हाथ में लिया। मगर न CCTV, न गवाह, न कोई ट्रैक। बिना किसी सुराग के, जांच आगे नहीं बढ़ सकी। अंततः यह केस CB-CID की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को सौंपा गया।

टीम ने दो साल तक बारीकी से जांच की। करीब 2,000 से अधिक लोगों से पूछताछ की गई। रेलवे अधिकारियों, पार्सल कंपनी कर्मचारियों, यहां तक कि हर उस व्यक्ति से, जो ट्रेन के आसपास था सभी से पूछताछ की गई, लेकिन सबका एक ही जवाब था- कुछ पता नहीं।

मोबाइल नेटवर्क से मिले 4-5 संदिग्ध नंबर

जब कोई तरीका काम नहीं आया तो स्पेशल टीम ने टेक्नोलॉजी का उपयोग किया। टीम ने सेलम से चेन्नई के बीच ट्रेन के चलने के दौरान मोबाइल नेटवर्क की डिटेल निकाली। उन्होंने उन सभी मोबाइल नंबरों को ट्रैक किया, जो इस रूट पर एक्टिव थे। सैकड़ों नंबरों में से 4–5 संदिग्ध मोबाइल नंबर सामने आए। इन सभी में एक समानता थी, इनके लोकेशन पैटर्न।

जैसे ही इन नंबरों की गहराई से जांच हुई, सामने आया कि सभी नंबर मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से खरीदे गए थे। कुछ नंबरों का ट्रैक बिहार से भी जुड़ा था। मगर सिर्फ मोबाइल नंबर से भला ये कैसे तय होता कि वही लुटेरे हैं?

नासा की मदद और सैटेलाइट से जांच

अब जांच एक कदम और आगे बढ़ी। पुलिस ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से सैटेलाइट इमेज की मदद मांगी। नासा की मदद से सेलम से विरुधाचलम के बीच की रात की इमेज खंगाली गईं और तब सामने आया चौंकाने वाला सच।

ट्रेन की छत पर कुछ संदिग्ध आकृतियां थीं, जो ट्रेन के साथ-साथ मूव कर रही थीं। पक्के तौर पर नहीं, लेकिन आशंका था कि ये वही लुटेरे थे, जो चलती ट्रेन की छत पर मौजूद थे।

2005 से पहले के थे नोट

CB-CID की रिपोर्ट में एक और रोचक तथ्य सामने आया कि लूटे गए सभी नोट 2005 से पहले के थे। अधिकतर नोट पुराने, कटे-फटे थे, इसलिए लूट के बाद भी लुटेरों के लिए रुपए चलाना इतना आसान नहीं था। सवाल ये था कि क्या लुटेरे इस बात से वाकिफ थे? या फिर उन्होंने सिर्फ इतना सोचा कि “नोट है, तो पैसा है”?

ट्रेन जब यार्ड में पहुंची थी तब चोरी का पता चला था।

ट्रेन जब यार्ड में पहुंची थी तब चोरी का पता चला था।

ये ट्रेन रॉबरी 1963 में लंदन में हुई वारदात की नकल थी

8 अगस्त 1963। लंदन तड़के 3 बजे। 16 से 17 डकैतों के एक गैंग ने उस जमाने में रॉयल मेल ट्रेन से पूरे 2.6 मिलियन डॉलर की लूट की थी। मामले की छानबीन के दौरान ब्रिटेन पुलिस ने 4 से 5 लोगों को वारदात का मास्टरमाइंड करार दिया था, लेकिन इसमें भी जो दो नाम सबसे ऊपर रहे वो थे रॉनी बिक्स और ब्रूस रेनॉल्ड। ट्रेन रॉबरी को रॉनी ने अपने 34वें जन्मदिन पर अंजाम दिया था। जब उसने और उसकी गैंग ने लंदन जा रही रॉयल मेल ट्रेन को बीच रास्ते में ही सिग्नल खराब कर रोक लिया। बेहद नाटकीय तरीके से एक ट्रक में कैश और दूसरी कीमती चीजें लादकर फरार हो गए। इसके लिए उन्होंने ट्रेक रोकते ही सबसे पहले ड्राइवर को निशाना बनाया। उसके सिर पर लोहे की रॉड से जानलेवा हमला किया। जिस जगह पर गैंग ने ट्रेन को रोका था। उन्हें वहां पकड़े जाने का डर था। उसके बाद गैंग खुद ही ट्रेन को काफी दूर तक चलाकर ले गई। लंबी मशक्कत के बाद एक-एक कर पुलिस ने आरोपियों को पकड़ा था।

इन सवालों के जवाब जानिए पार्ट 2 में

– किसने की थी ट्रेन डकैती?

– चलती ट्रेन में डकैती को अंजाम देने वाला मास्टरमाइंड कौन था?

– रुपए किस तरह शिफ्ट किए गए?

– आरोपियों ने पुलिस को क्या बताया?

– आरोपियों ने लूट के रुपयों का क्या किया?



Source link