रविरमन त्रिपाठी/भिंड: 1971 की जंग को भले ही सालों बीत चुके हों, लेकिन चंबल की मिट्टी ने जो बेटों की कुर्बानी देखी थी, उसकी यादें आज भी ज़िंदा हैं. उस दौर में भिंड जिले के 12 सैनिक पाकिस्तान से लड़ते हुए शहीद हो गए थे. अब करीब 54 साल बाद, उनके परिवारों तक बांग्लादेश सरकार की ओर से भेजा गया गार्ड ऑफ ऑनर सम्मान पहुंचा है. जिन घरों में कभी तिरंगे में लिपटी खबर आई थी, वहां अब वर्दी में सजे सैनिक गाड़ी से सम्मान लेकर पहुंचे, तो वो लम्हा एक बार फिर भारी हो गया.
शहीद रामलखन गोयल की पत्नी लीला देवी बताती हैं, “मैं तो घर पर बैठी थी, तभी बाहर आर्मी की गाड़ी आकर रुकी. कुछ जवान उतरे और पूछा कि क्या यह रामलखन गोयल का घर है. मैंने कहा, हां. फिर उन्होंने मेरे पैर छूकर कहा आपके पति 1971 की लड़ाई में शहीद हुए थे, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आपके लिए ये सम्मान भेजा है.” लीला देवी बताती हैं कि ये सुनते ही वो फफक पड़ीं. “पति को आखिरी बार नहीं देख पाई थी… अब लगा कि जैसे उन्होंने खुद ही मुझे याद किया हो.”
एक और शहीद जय सिंह की पत्नी राजेश्वरी की आंखें भी उस दिन भर आईं. वो कहती हैं, “मेरी शादी तो सिर्फ 14 साल की उम्र में हो गई थी. मैं मायके में थी जब तार आया कि आपके पति अब नहीं रहे. उस वक्त ना अंतिम दर्शन हुए, ना कोई औलाद थी.” राजेश्वरी ने बताया कि अब 54 साल बाद जब ये सम्मान आया, तो लगा जैसे वो कहीं से देख रहे हैं… और कह रहे हों मैं तुम्हें भूला नहीं हूं.”
भिंड जिले से 1971 की लड़ाई में 12 जवान शहीद हुए थे, लेकिन इनमें से कुछ ही परिवारों तक ये सम्मान पहुंच पाया है. बांग्लादेश सरकार ने ये गार्ड ऑफ ऑनर 2018 में भेजा था, लेकिन किन्हीं वजहों से अब जाकर वह परिवारों तक पहुंचा. बाकी परिवार अब भी सम्मान मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
हवलदार हुकुम सिंह, जिन्होंने खुद 1971 की जंग लड़ी थी, ने न्यूज 18 से बात करते हुए कहा, “हमने बंदूकें नहीं चलाईं, हमने देश की इज्जत की लड़ाई लड़ी थी. आज जब हमारे साथियों को बांग्लादेश की ओर से ये सम्मान मिला है, तो दिल को सुकून मिला.”
भूतपूर्व सैनिक संगठन के जिला अध्यक्ष राकेश सिंह कुशवाह ने कहा, “भिंड के वीरों ने 1971 की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. हमें गर्व है कि अब उन्हें दूसरे देश से भी सम्मान मिल रहा है. सरकार को चाहिए कि बाकी वीर परिवारों तक भी ये सम्मान समय पर पहुंचे.”
शहादत की कोई मियाद नहीं होती. 54 साल बाद भी अगर कोई देश आपके पति को याद करता है, तो वो सिर्फ एक सम्मान नहीं होता वो एक एहसास होता है, कि किसी ने उन्हें भुलाया नहीं. भिंड की मिट्टी से निकले वो वीर सपूत शायद अब भी अपने घरों में लौटे सम्मान के साथ, गर्व के साथ, और एक खामोश सलाम के साथ.