एमपी में हिंदी में डॉक्टरी की पढ़ाई कामयाब नहीं: तीन साल में किताबों पर 10 करोड़ खर्च; एक भी स्टूडेंट ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी – Madhya Pradesh News

एमपी में हिंदी में डॉक्टरी की पढ़ाई कामयाब नहीं:  तीन साल में किताबों पर 10 करोड़ खर्च; एक भी स्टूडेंट ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी – Madhya Pradesh News


12 अक्टूबर 2022 को केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने हिन्दी में एमबीबीएस पाठ्यक्रम की शुरुआत की थी।

मप्र में हिन्दी में डॉक्टरी पढ़ाने वाला प्रोजेक्ट पूरी तरह से कामयाब नहीं हुआ है। सरकार ने 10 करोड़ रु. खर्च कर हिन्दी में किताबें छपवाई, लेकिन एक भी छात्र ने परीक्षा में सवालों के उत्तर हिन्दी में नहीं लिखे हैं। दरअसल, तीन साल पहले 2022 में बड़े जोश

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उस समय सरकार ने दावा किया था कि इससे उन छात्रों को फायदा होगा जो हिन्दी मीडियम से पढ़ाई कर मेडिकल में दाखिला लेते हैं। भास्कर ने मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट्स से बात की तो उन्होंने कहा कि वे हिन्दी की बजाय अंग्रेजी को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपना फ्यूचर भी देखना है। वहीं गांधी मेडिकल कॉलेज की डीन कहा कि पाठ्यक्रम होने के बाद से पढ़ाने के तरीके में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

बता दें कि 21 जुलाई से एक बार फिर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए काउंसलिंग शुरू होने वाली है। पढ़िए रिपोर्ट

इन दो केस से समझिए दावे और हकीकत में फर्क

1. हिन्दी मीडियम से 12वीं की मगर अब अंग्रेजी ही पढ़ रहा हूं सीधी के रहने वाले अंकित पांडे ने 2022 में एडमिशन लिया था। 12वीं और NEET का एग्जाम भी हिन्दी में ही दिया था। अंकित कहते हैं कि जब मेडिकल में एडमिशन लिया तो एक डर था कि अंग्रेजी में पढ़ाई कैसे करूंगा? एग्जाम कैसे दूंगा? यहां आया तो पता चला कि हिन्दी की किताबें हैं। क्लासरूम में गए तो टीचर छात्रों से संवाद हिन्दी में ही करते हैं, भले ही स्लाइड अंग्रेजी में हो। इसके बाद मेरा डर निकल गया।

मैंने देखा कि अंग्रेजी की ही किताबों को हिन्दी में लिखा गया था। जो अंग्रेजी की शब्द थे वो केवल हिन्दी में लिखे थे। मैंने अंग्रेजी की किताबें ही पढ़ना शुरू कर दी। इसके बाद एग्जाम की भाषा भी अंग्रेजी ही थी। अंकित बताते हैं कि तीन साल में एक भी एग्जाम हिन्दी में नहीं लिखा है, भले ही मेरी इंग्लिश ज्यादा अच्छी नहीं है। मैं इतनी अंग्रेजी लिख लेता हूं कि टीचर को समझ आ जाए।

शुरुआत में जब हिन्दी मीडियम के बच्चे एडमिशन लेते हैं तो वो भी बाद में अंग्रेजी में लिखना शुरू कर देते हैं। हमारे कई सारे टीचर भी हिन्दी मीडियम से पढ़े और बाद में उन्होंने अंग्रेजी में एग्जाम दिया। अंकित से पूछा कि आगे दोनों में से किस भाषा को ज्यादा तवज्जो देंगे तो अंकित ने कहा- मैं हिन्दी पहले से पढ़कर आया हूं। इसलिए मैं अंग्रेजी को सिलेक्ट करूंगा।

हिन्दी की किताबों का रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल गांधी मेडिकल कॉलेज में थर्ड ईयर की स्टूडेंट मुस्कान प्रजापति बताती है कि जो किताबें हिन्दी में है उनमें और अंग्रेजी की किताबों में ज्यादा फर्क नहीं है। इनमें फर्क केवल इतना है कि मेडिकल टर्म को हिन्दी में लिखा है। जैसे ‘लिवर’ को ‘यकृत’ नहीं लिखा है उसे लिवर ही लिखा है। लिम्ब को लिम्ब ही लिखा है।

मुस्कान ने एनोटॉमी की किताब का एक पैराग्राफ पढ़कर सुनाया- अपर लिंब्स पेक्टोरल गर्डल द्वारा ट्रंक से जुड़े होते हैं। लिम्ब गर्डल को ऐसे बोन्स के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो लिम्ब्स को एक्जियल स्केलेटन से जोड़ा करती है। पेक्टोरल गर्डल दो बोन्स से बना होता है। स्कैपुला और क्लेविकल स्कैपुला एक्रोमियोक्लेविकुलर जॉइंट द्वारा क्लेविकल से जुड़ी होती है।

मुस्कान आगे कहती है कि अब इस तरह से मेडिकल टर्म के शब्द हिन्दी में लिखे हैं तो ज्यादातर स्टूडेंट अंग्रेजी ही पढ़ते हैं। हिन्दी की किताबों का इस्तेमाल हम लोग रेफरेंस बुक्स के तौर पर करते हैं। यदि अंग्रेजी में कोई पैरा समझ नहीं आ रहा है तो उसे हिन्दी की किताब में देखकर समझ लेते हैं, लेकिन नोट्स से लेकर परीक्षा अंग्रेजी में ही देते हैं। अंग्रेजी में लिखना हमारे लिए ज्यादा सरल है।

एमबीबीएस फर्स्ट ईयर के एनोटॉमी विषय का एक चैप्टर। जिसमें मेडिकल टर्म अंग्रेजी और हिन्दी में लिखी गई है।

एमबीबीएस फर्स्ट ईयर के एनोटॉमी विषय का एक चैप्टर। जिसमें मेडिकल टर्म अंग्रेजी और हिन्दी में लिखी गई है।

एक भी छात्र ऐसा नहीं जिसने हिन्दी में उत्तर लिखे मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी जबलपुर के रजिस्ट्रार पीएस बघेल बताते हैं कि मध्यप्रदेश के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हिन्दी में एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हो गई है। उनसे पूछा कि पिछले तीन सालों में कितने छात्रों ने परीक्षा में हिन्दी में उत्तर लिखे हैं, तो उन्होंने कहा कि ऐसा एक भी छात्र नहीं है जिसने हिन्दी में उत्तर लिखे हो। एमबीबीएस के सभी छात्र एग्जाम में अंग्रेजी में ही जवाब लिखते हैं।

परीक्षा फॉर्म में अब हिन्दी का ऑप्शन बघेल ने बताया कि छात्र जो एग्जाम फॉर्म भरते हैं उसमें अभी तक भाषा का माध्यम चुनने की बाध्यता और विकल्प नहीं था। अभी तक ये माना जाता था कि मेडिकल का एग्जाम आपको अंग्रेजी में ही देना है। तीन साल पहले जब हिन्दी में पाठ्यक्रम शुरू हुआ तब भी ऐसी कोई बाध्यता नहीं रखी। स्टूडेंट दोनों ही भाषाओं में अपना उत्तर लिख सकते थे।इसके बाद भी ज्यादातर छात्रों ने अंग्रेजी भाषा को ही चुना है।

हिन्दी में एमबीबीएस को चुना तो फीस में 50% छूट रजिस्ट्रार बघेल ने बताया कि हिन्दी में मेडिकल और डेंटल की परीक्षा देने वाले स्टूडेंट्स के लिए सरकार ने प्रोत्साहन देने का फैसला किया है। सरकार ने तय किया है कि ऐसे स्टूडेंट को परीक्षा फीस में 50 फीसदी की छूट मिलेगी। अभी एमबीबीएस की औसत परीक्षा फीस 6 हजार रुपए है। इसके अलावा यदि स्टूडेंट ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन में मैरिट में आते हैं तो उन्हें नकद पुरस्कार मिलेगा।

हिन्दी काे प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह इनाम देने और परीक्षा शुल्क आधा करने वाला मप्र देश का पहला राज्य होगा।

डीन बोलीं- पहले भी ‘हिंग्लिश’ में ही पढ़ाते थे गांधी मेडिकल कॉलेज की डीन कविता सिंह ने बताया कि MBBS की कक्षाएं हिन्दी पाठ्यक्रम से पहले भी आमतौर पर ‘हिंग्लिश’ में होती थीं। यानी आधी अंग्रेजी और आधी हिन्दी में। जो लिखित कार्य है वो पूरी तरह से अंग्रेजी में होता था। हिन्दी में पाठ्यक्रम शुरू करने के बाद टीचर्स को कहा गया कि वे हिन्दी में भी लिखें और अपने प्रेजेंटेशन में हिन्दी सामग्री को शामिल करने की कोशिश करें।

वे बताती हैं कि गांधी मेडिकल कॉलेज को हिन्दी पाठ्यक्रम के लिए नोडल एजेंसी बनाया है हमने सभी विषयों की किताबों का हिन्दी अनुवाद कर दिया है। जो किताबें बनाई हैं वो शुद्ध हिन्दी में नहीं है बल्कि मिक्स्ड लैंग्वेज में है। जो पेपर तैयार होते हैं वो हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में होते हैं। स्टूडेंट चाहे तो हिन्दी या अंग्रेजी दोनों में से एक भाषा में उत्तर लिख सकते हैं। छात्रों को पढ़ाने वाली फैकल्टी एक ही है।

राजभाषा समिति ने जानी हिन्दी पाठ्यक्रम की चुनौतियां मप्र में हिन्दी में एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हुए तीन साल हो चुके हैं। 2 जुलाई को संसद की राजभाषा समिति के सदस्यों ने गांधी मेडिकल कॉलेज का दौरा किया था। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों से बात कर हिन्दी की पढ़ाई में आ रही चुनौतियों को समझा।

समिति के संयोजक और सांसद उज्जवल सिंह रमन ने भास्कर से बातचीत में कहा कि समिति ये देखने आई थी कि क्या ये मॉडल देश के बाकी राज्यों में लागू हो सकता है या नहीं? बैठक में ये बात सामने आई कि जो बच्चे हिन्दी माध्यम से पढ़ाई कर मेडिकल में प्रवेश लेते हैं वो तो इन किताबों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अंग्रेजी मीडियम के बच्चों को इसमें दिलचस्पी नहीं है।

हिन्दी मीडियम से आने वाले बच्चों की संख्या 10 से 15 फीसदी होती है। यानी यदि एमबीबीएस की 2 हजार सीटें हैं तो 200 स्टूडेंट ही हिन्दी मीडियम के होंगे। उनसे पूछा कि पोस्ट ग्रेजुएशन और रिसर्च में हिन्दी का इस्तेमाल पर कोई बातचीत हुई तो बोले- अभी सिर्फ एमबीबीएस पर फोकस है। पीजी व रिसर्च में हिन्दी को लाना एक क्रमिक प्रक्रिया होगी।

2-3 जुलाई को संसदीय राजभाषा समिति की भोपाल में बैठक हुई जिसमें एमबीबीएस के हिन्दी पाठ्यक्रम की चुनौतियों के बारे में चर्चा हुई।

2-3 जुलाई को संसदीय राजभाषा समिति की भोपाल में बैठक हुई जिसमें एमबीबीएस के हिन्दी पाठ्यक्रम की चुनौतियों के बारे में चर्चा हुई।



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