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Chilli Farming: कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार खेतों में पानी भराव, नमी वाली मिट्टी और जल निकासी की कमी मिर्च की जड़ों को कमजोर बना देती है. इससे फफूंद तेजी से पनपता है और पौधों की जड़ें गलने लगती हैं. (रिपोर्ट: दीपक पांडे)
मध्य प्रदेश का खरगोन मिर्च उत्पादन में पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा उत्पादन देने के लिए जाना जाता है. खरीफ सीजन में बड़े पैमाने पर किसान मिर्च की खेती करते हैं लेकिन जिन किसानों ने अपने खेतों में मिर्च की फसल लगाई है, उन्हें अब विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है.

खासकर बारिश के इस मौसम में मिर्च की फसल को जड़ सड़न रोग (Root Rot) का खतरा सबसे ज्यादा होता है. यह बीमारी मिट्टी में मौजूद फफूंद के कारण होती है और यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए, तो पूरी फसल चौपट हो सकती है.

बदलते मौसम का प्रभाव इन दिनों मिर्च की फसल पर दिखाई दे रहा है. ऐसे में कृषि एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि किसान रासायनिक दवाओं की बजाय देसी जैविक घोल का उपयोग करें, जो न सिर्फ असरदार है, बल्कि मिट्टी और फसल दोनों के लिए सुरक्षित भी है.

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार खेतों में पानी भराव, नमी वाली मिट्टी और जल निकासी की कमी मिर्च की जड़ों को कमजोर बना देती है. इससे फफूंद तेजी से पनपता है और पौधों की जड़ें गलने लगती हैं. इसके बाद पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है और मर जाता है.

खरगोन कृषि विज्ञान केंद्र में पदस्थ उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ एसके त्यागी लोकल 18 को बताते हैं कि अगर मिर्च के पौधे अचानक मुरझाने लगें, पत्तियां पीली पड़ जाएं और हल्का खिंचाव देने पर पूरा पौधा जड़ सहित निकल आए, तो समझिए कि जड़ सड़न हो चुकी है. कई बार जड़ काली होकर सड़ने लगती है और पौधा नीचे से गल जाता है.

किसान भाई फसल को जड़ सड़न रोग से बचाने के लिए खेत में जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त रखें. ड्रिंकिंग के साथ ही 15 लीटर के पंप में एक किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 50 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर प्रति एकड़ खेत में मिट्टी में डालें.

इससे जमीन पर फफूंद नियंत्रण में रहती है और फसल सुरक्षित रहती है. जहां पौधों में बीमारी की शुरुआत दिखाई दे रही हो, वहां 30 ग्राम कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब फफूंदनाशी का छिड़काव पौधों की जड़ों में ड्रिंकिंग से करें.

यह सप्ताह में एक बार करें और लगातार दो से तीन बार दोहराएं. बीमारी बढ़ने पर प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़कर खेत से बाहर करें ताकि अन्य पौधों में संक्रमण न फैले.