भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज और हमीदिया अस्पताल ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां डॉक्टरों ने गिलैन-बैरे सिंड्रोम (GBS) से जूझ रहे 26 वर्षीय अभिषेक को चार महीने से अधिक समय तक ICU में वेंटिलेटर पर रखकर उसका जीवन बचाया।
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अभिषेक, जो सेल्समैन का काम करते थे, 17 अप्रैल को अचानक दोनों पैरों में कमजोरी की शिकायत के साथ हमीदिया अस्पताल पहुंचे। कुछ ही घंटों में कमजोरी हाथों तक पहुंच गई। जांच में उनके शरीर के सभी रिफ्लेक्स गायब थे। हालत इतनी गंभीर थी कि उसी दिन उन्हें इंटुबेट कर मेडिसिन ICU में शिफ्ट किया गया। डॉक्टरों ने 7 चक्र प्लाज्मा फेरेसिस किए, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ। बाद में नर्व कंडक्शन स्टडी में शुद्ध मोटर एक्सोनल न्यूरोपैथी का पता चला। इसके बाद IVIG (इंट्रावीनस इम्युनोग्लोबुलिन) थेरेपी दी गई।
इलाज के दौरान आईं चुनौतियां अभिषेक की हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें लंबे समय तक ICU में रहना पड़ा। ऑटोनोमिक डिस्फंक्शन के चलते उनकी हृदय गति और ब्लड प्रेशर लगातार बिगड़ते रहे। उन्हें वेंटिलेटर-एसोसिएटेड निमोनिया भी हो गया, जिसके लिए हाई-एंड एंटीबायोटिक्स दिए गए। बीच में ट्रैकेओस्टॉमी की गई। इस दौरान डॉक्टरों की सबसे बड़ी चुनौती थी संक्रमण और ऑर्गन फेल्योर से बचाना।
4 महीने बाद मिली जिंदगी
मेडिसिन, क्रिटिकल केयर, नर्सिंग और फिजियोथेरेपी टीम के समर्पण ने कमाल कर दिखाया। अभिषेक को 4 महीने और 7 दिन वेंटिलेटर पर रखने के बाद सफलतापूर्वक हटाया गया। ICU में कुल 4 महीने 11 दिन रहने के बाद, 28 जुलाई को उन्हें सामान्य वार्ड में शिफ्ट किया गया। फिलहाल वे लिक्विड ही ले रहे हैं, गर्दन संभाल सकते हैं और हल्की आवाज में बात कर सकते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि नियमित फिजियोथेरेपी से वे आने वाले महीनों में पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।
GBS घातक रोग
गिलैन-बैरे सिंड्रोम (GBS) एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली नसों को नुकसान पहुंचाती है। यह तेजी से लकवे जैसी स्थिति में बदल जाती है। गंभीर मामलों में मरीज को महीनों तक वेंटिलेटर पर रहना पड़ता है। यह केस बताता है कि सही समय पर इलाज मिलने से मरीज की जान बचाई जा सकती है।
हमीदिया अस्पताल के डॉ. मनीराम ने बताया कि यह टीम वर्क के कारण संभव हो सका है।आमतौर पर GBS के मरीज औसतन 3-4 हफ्ते में वेंटिलेटर से मुक्त हो जाते हैं। कई मरीजों में इसके बाद बीमारी के अलावा अन्य इंफेक्शन से भी उसकी मौत होने की संभावना रहती है। लेकिन, हमने हार नहीं मानी और मरीज ने भी हिम्मत नहीं छोड़ी। जिस वजह से अभिषेक ने 127 दिन ICU में बिताए।