राजगढ़ में बेटे के जन्म की मन्नत पूरी होने पर राजा 450 किमी दूर से भगवान को हाथी पर लेकर आए थे।
राजगढ़ जिले के खिलचीपुर तालाब किनारे खड़ा श्री गोवर्धननाथजी मंदिर केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है… यह उस मन्नत की निशानी है, जिसे पूरा करने के लिए राजा राव बहादुर भवानी सिंह ने 450 किलोमीटर पैदल यात्रा की थी। भगवान श्रीनाथजी की प्रतिमा को सम्मानपूर्वक
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सालों तक संतान का सुख न मिलने से राजा भवानी सिंह मन ही मन उदास रहते थे। एक दिन उन्होंने श्रीनाथजी से वचन लिया कि अगर पुत्र रत्न मिला तो नाथद्वारा से श्रीनाथजी का स्वरूप लाकर नगर में भव्य मंदिर बनाऊंगा।
26 अगस्त 1897 का दिन राजघराने में खुशियों की बारिश लेकर आया। महल में नन्हे कदमों का शोर गूंजा और राजकुमार दुर्जन साल सिंह का जन्म हुआ। बस, इसके बाद राजा ने मन्नत पूरी करने की तैयारी शुरू कर दी।
राजगढ़ जिले के खिलचीपुर तालाब किनारे है श्री गोवर्धननाथजी मंदिर।

राजा राव बहादुर भवानी सिंह ने बेटे के जन्म पर 450 किलोमीटर पैदल यात्रा की थी।
नाथद्वारा से आस्था की पदयात्रा सन् 1902 में राजा ने नाथद्वारा के लिए यात्रा शुरू की। रास्ता आसान नहीं था- न बारिश की परवाह, न धूप की चिंता। नाथद्वारा पहुंचकर उन्होंने श्रीनाथजी का स्वरूप प्राप्त किया। वापसी में प्रतिमा को फूल-मालाओं से सजे हाथी पर रखा गया। यह नजारा इतना भव्य था कि रास्ते में गांव-गांव लोग दर्शन के लिए उमड़ पड़ते।

शुरुआत के समय मंदिर में इस तरह से प्रतिमाएं रखी थीं।
नगर में भव्य स्वागत, तालाब किनारे हुई स्थापना जब राजा हाथी पर श्रीनाथजी का स्वरूप लेकर नगर में पहुंचे तो खिलचीपुर नगर आस्था के सागर में डूब गईं। इंदौर के महाराज श्री बच्चूलाल जी ने तालाब किनारे बने मंदिर में विधि-विधान से प्रतिमा की स्थापना कराई।
सपना था तालाब के बीच मंदिर हो, रह गया अधूरा मन्दिर के मुखिया राजेन्द्र तिवारी ने बताया की राजा भवानी सिंह का सपना था कि मंदिर तालाब के बीच बने, ताकि पानी में प्रतिबिंबित भगवान का स्वरूप और भी दिव्य दिखे। लेकिन असमय निधन के कारण यह सपना अधूरा रह गया। आज मंदिर तालाब के किनारे खड़ा है, और 123 साल बाद भी उतना ही भव्य और पवित्र लगता है।

महाराज भवानी सिंह अपने पुत्र दुर्जन साल सिंह के साथ।
चार पीढ़ियों से हो रही सेवा मंदिर सेवा करने वाले राजेंद्र तिवारी बताते हैं हमारे दादा बल्लभदास ने पूजा शुरू की थी। फिर पिता दामोदरदास, और अब मैं अपने बेटों तरुण व अमन के साथ यह सेवा कर रहा हूं। यह केवल पूजा नहीं, पीढ़ियों से चलती आ रही आस्था की जिम्मेदारी है।
जन्माष्टमी पर लगता आस्था का मेला जन्माष्टमी की रात यहां का नजारा देखते ही बनता है। मंदिर फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से जगमगा उठता है। झूला सजता है, भजन-कीर्तन होते हैं और मध्यरात्रि में भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है। आसपास से हजारों लोग आते हैं, रातभर आस्था की गूंज सुनाई देती है।

मंदिर में चलने वाले भजन-कीर्तन में पहुंचे श्रद्धालु।
गोवर्धन पूजा भी राजघराने के नाम से दीपावली के बाद होने वाली गोवर्धन पूजा में भी यहां खास परंपरा है। इस दिन की पूजा आज भी राज परिवार के नाम से होती है। राजघराने के वंशज मंदिर में आकर पूजा करते हैं। राजा की शुरू की गई यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा से निभाई जाती है।
राजा की भक्ति ने दिया शहर को पहचान यह कहानी केवल एक मंदिर की नहीं, बल्कि उस भक्ति और संकल्प की है, जिसने खिलचीपुर को पहचान दी। राजा भवानी सिंह ने वचन निभाने के लिए लंबी पदयात्रा की, हाथी पर भगवान का स्वरूप रखकर लाए और नगर को एक ऐसा मंदिर दिया जो आज भी खिलचीपुर की शान है।