फेफड़ों पर हावी हो रहा रेस्पीरेट्री सिंसेशियल वायरस: बच्चे बुखार-खांसी के लक्षण के साथ आ रहे ओपीडी में, 2 माह से 2 साल की आयु तक खतरा ज्यादा – Bhopal News

फेफड़ों पर हावी हो रहा रेस्पीरेट्री सिंसेशियल वायरस:  बच्चे बुखार-खांसी के लक्षण के साथ आ रहे ओपीडी में, 2 माह से 2 साल की आयु तक खतरा ज्यादा – Bhopal News


अचानक तेज बारिश, अगले दिन कड़ी धूप और फिर उमस… राजधानी का मौसम लगातार करवट ले रहा है। बारिश से गंदगी और दूषित पानी की समस्या भी बढ़ी है। यही कारण है कि इन दिनों वायरस और बैक्टीरिया दोनों सक्रिय हो गए हैं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि

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बच्चों पर ज्यादा असर सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। जेपी अस्पताल में बाल रोगी ओपीडी में मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पियूष पंचरत्न ने बताया कि सामान्य दिनों में रोजाना औसतन 80 बच्चे ओपीडी में आते हैं। अब यह संख्या 150 के करीब पहुंच गई है। इनमें वायरल के साथ बैक्टीरियल इंफेक्शन भी है।

लगभग 7-8 फीसदी बच्चों को गंभीर स्थिति में भर्ती करना पड़ रहा है। जिन्हें सांस लेने में तकलीफ या पसली चलने जैसी समस्या होती है। इसका प्रमुख कारण रेस्पीरेट्री सिंसेशियल वायरस (आरएसवी) का एक्टिव होना है। इसके कारण बच्चों में फेफड़ों का इंफेक्शन देखने को मिल रहा है।

इधर, मंगलवार को एम्स भोपाल में 15 साल से कम आयु के 723 मरीज बाल रोग विभाग की ओपीडी में पहुंचे। हमीदिया अस्पताल में यह संख्या 576 रही।

जेपी अस्पताल के बाल रोग ओपीडी में मरीजों की संख्या बढ़ी।

आरएसवी क्या है और क्यों खतरनाक रेस्पीरेट्री सिंसेशियल वायरस (RSV) आमतौर पर सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण देता है, लेकिन यह छोटे बच्चों, खासकर 2 साल से कम उम्र के शिशुओं में गंभीर न्यूमोनिया और ब्रोंक्योलाइटिस का कारण बन सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल दुनिया में करीब 30 लाख बच्चे इस वायरस से प्रभावित होते हैं। इनमें से कई को आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है।

बड़ों के लिए भी खतरा! हालांकि RSV ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है, लेकिन कमजोर इम्यूनिटी वाले बुजुर्ग और अस्थमा/दिल की बीमारी वाले मरीज भी इसके शिकार हो सकते हैं।

कैसे फैलता है वायरस डॉक्टर बताते हैं कि RSV संक्रमित व्यक्ति की खांसी-छींकों से निकले ड्रॉपलेट्स के जरिए फैलता है। छोटे बच्चों में यह तेजी से फैलता है क्योंकि वे अक्सर खिलौनों या एक-दूसरे के बर्तनों को साझा करते हैं।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पंचरत्न ने बताया-

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कई परिजन मेडिकल स्टोर से मनमर्जी की दवा देकर बच्चों का इलाज करने की कोशिश करते हैं। जिससे स्थिति और बिगड़ रही है। बच्चों को खुद से दवा न दें। बुखार की स्थिति में केवल पैरासिटामॉल दी जा सकती है। यदि आराम न मिले तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

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जेपी अस्पताल के डॉ. योगेंद्र श्रीवास्तव ने बताया-

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आमतौर पर इस मौसम में वायरल के केस घट जाते हैं, लेकिन इस बार उल्टी-दस्त और टाइफाइड तेजी से बढ़े हैं। यह दूषित पानी और गंदे खाने से हो रहे हैं। अभी ह्यूमन राइनोवायरस और ई-कोलाई बैक्टीरिया दोनों ही सक्रिय हैं, जो वयस्क मरीजों को ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं।

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दवा से राहत मिल रही है सिविल सर्जन डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने कहा कि वायरस से होने वाले लक्षण जैसे सर्दी, नाक बहना, हल्का बुखार या थकान, अधिकतर मरीजों में एक हफ्ते में ठीक हो जाते हैं। करीब 25% मरीजों में लक्षण दो हफ्ते तक रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल अधिकांश मरीजों को सामान्य दवाओं से राहत मिल रही है।

बचाव के उपाय

  • हमेशा शुद्ध और उबला हुआ पानी पिएं।
  • ठंडी वस्तुओं का सेवन कम करें।
  • बासी भोजन न खाएं, बच्चों को घर का ताजा खाना ही दें।
  • बच्चों को बीमार बच्चों से दूर रखें और यदि बच्चा बीमार है तो उसे स्कूल न भेजें।
  • गले में खराश होने पर गुनगुने पानी से गरारे करें।

डॉक्टरों ने बताईं तीन बड़ी वजह

  • लगातार बदलता मौसम: शरीर को अनुकूल होने का समय नहीं मिल रहा।
  • शहर की धूल: गले और सांस की नली में इन्फेक्शन बढ़ा रही है।
  • लापरवाही: बीमार होने के बावजूद लोग मास्क नहीं लगा रहे और सावधानी नहीं बरत रहे।

लक्षण जिन पर ध्यान दें

  • गले में खराश
  • तेज सर्दी
  • खांसी और कफ
  • बुखार
  • गले में कांटे जैसा एहसास
  • बदन दर्द और पेट दर्द



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