काजू कतली रह गई पीछे, एमपी की इस मिठाई ने सबका दिल लिया जीत, ना सिर्फ स्वाद में आगे, परंपरा में भी नंबर 1

काजू कतली रह गई पीछे, एमपी की इस मिठाई ने सबका दिल लिया जीत, ना सिर्फ स्वाद में आगे, परंपरा में भी नंबर 1


मध्य प्रदेश की धरती अपने खानपान और परंपराओं के लिए पूरे देश में जानी जाती है. यहां की बोली, यहां का पहनावा और यहां का स्वाद लोगों को अपनी ओर खींच लेता है. इसी स्वाद की दुनिया में एक ऐसी मिठाई है जो वर्षों से हर घर की रसोई और त्योहारों की शान बनी हुई है. नाम है गुजिया.

गुजिया सिर्फ एक मिठाई नहीं बल्कि एक परंपरा है. होली हो या दिवाली, तीज हो या परिवार का कोई खास अवसर – गुजिया हर थाली में अपनी जगह बनाए रहती है. यही कारण है कि कई लोग कहते हैं – “मिठाईयों की रानी अगर काजू कतली है, तो मिठाईयों का दिल जरूर गुजिया है.”

गुजिया का इतिहास और पहचान
गुजिया की शुरुआत को लेकर कई किस्से सुनने को मिलते हैं. माना जाता है कि इसका चलन मुगलों के दौर में उत्तर भारत में शुरू हुआ. धीरे-धीरे यह मिठाई मध्य प्रदेश की रसोई तक पहुंची और यहीं की खासियत बन गई. एमपी के हर जिले में इसे अलग-अलग अंदाज में बनाया जाता है. कहीं इसमें नारियल और खोया का भरावन होता है तो कहीं सूखे मेवे और इलायची इसे और खास बना देते हैं. कहा जाता है कि पहले के जमाने में जब लोग बड़े-बड़े उत्सव मनाते थे, तो मिठाइयां भी घर में ही बनाई जाती थीं. तब महिलाएं सामूहिक रूप से बैठकर गुजिया बनातीं और यही परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई.

बनाने की खासियत
गुजिया बनाने में सबसे ज्यादा ध्यान उसके भरावन और कुरकुरेपन पर दिया जाता है. मैदे के आटे में भरकर इसे सुनहरी आंच पर तला जाता है. अंदर का भरावन सूजी, खोया, नारियल, बादाम, काजू और किशमिश से तैयार होता है. ऊपर से मीठा चाशनी का लेप या पाउडर शुगर का छिड़काव, इसके स्वाद को और लाजवाब बना देता है.एमपी में खासतौर पर खंडवा, इंदौर, भोपाल और ग्वालियर की गुजिया मशहूर मानी जाती है. यहां के हलवाई इसे इतने सलीके से बनाते हैं कि खाने वाले एक बार चखकर इसे कभी भूल नहीं पाते.

त्योहारों की जान – गुजिया
मध्य प्रदेश में गुजिया को सबसे ज्यादा महत्व होली पर दिया जाता है. कहा जाता है कि बिना गुजिया के होली अधूरी है. रंगों के त्योहार में जब गुजिया की मिठास घुलती है तो उत्सव का मज़ा दोगुना हो जाता है. कई परिवार तो इसे खास परंपरा मानकर पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं. इसी तरह तीज-त्योहारों पर बहुएं और बेटियां मायके से ससुराल जाते समय गुजिया लेकर जाती हैं. यह केवल मिठाई नहीं बल्कि रिश्तों की मिठास का प्रतीक भी है.

आधुनिक अंदाज में गुजिया
आज के समय में गुजिया ने कई नए रूप ले लिए हैं. बाजारों में चॉकलेट गुजिया, बेक्ड गुजिया और ड्राई फ्रूट्स से भरी रिच गुजिया मिलती है. लेकिन इसके बावजूद पारंपरिक खोया और नारियल वाली गुजिया का स्वाद कोई नहीं हरा पाया है. यही वजह है कि एमपी की यह मिठाई काजू कतली जैसी नामी मिठाइयों को भी टक्कर देती है.

क्यों है खास?
यह मिठाई घर की परंपरा और त्योहारों की शान है.
बनाने में मेहनत भले ही ज्यादा लगे, लेकिन इसका स्वाद सब थकान मिटा देता है.
गुजिया हर वर्ग के लोगों को पसंद आती है, चाहे बच्चा हो या बुजुर्ग.
इसमें मौजूद सूखे मेवे और खोया इसे पौष्टिक भी बनाते हैं.

मध्य प्रदेश की गुजिया सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि संस्कृति की पहचान है. यह हर त्योहार की थाली में मिठास घोलती है और हर रिश्ते में अपनापन जोड़ती है. यही कारण है कि आज भी जब मिठाइयों की बात होती है, तो लोग कहते हैं – “काजू कतली अपनी जगह, लेकिन गुजिया का स्वाद सबसे अलग.”



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