शहर में बुधवार को जलझूलनी एकादशी महापर्व पर परंपरागत डोल शोभायात्रा निकली। इसमें जिले के विभिन्न मंदिरों से निकले करीब 50 देव विमान और 12 अखाड़ों के दल शामिल हुए।
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यात्रा दोपहर से शुरू होकर टोड़ी गणेश मंदिर पहुंची और वहां से परंपरागत मार्ग होते हुए शाम को बंजारा डैम पर संपन्न हुई, जहां भगवान श्रीकृष्ण का जलवा पूजन सूर्यदेव की साक्षी में किया गया।
लोगों ने लिया भगवान का आशीर्वाद
शोभायात्रा में शामिल देव विमानों को फूलों, झालरों और आकर्षक सजावट से सजाया गया था। डोल यात्रा देखने के लिए शहरवासियों के साथ-साथ जिलेभर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
मार्गों पर श्रद्धालुओं ने देव विमानों का स्वागत किया और भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। डोल बंजारा डैम पर पहुंचते ही भक्तों के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा।
युवाओं ने करतब दिखाए
शोभायात्रा का मुख्य आकर्षण अखाड़ों के दल रहे। करीब 12 अखाड़ों के युवाओं ने करतब दिखाकर लोगों का रोमांच बढ़ा दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार जलझूलनी एकादशी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के 18 दिन बाद मनाई जाती है।
शोभायात्रा में युवतियों ने करतब दिखाए।

पर्व को लेकर ये है मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन मैया यशोदा भगवान श्रीकृष्ण को लेकर नदी के तट पर जलवा पूजन करने गई थीं। उसी परंपरा का निर्वहन आज भी श्योपुर में डोल शोभायात्रा के माध्यम से किया जाता है।
श्रीजी मंदिर से देव विमान में भगवान की शोभायात्रा निकालकर बंजारा डैम तक ले जाया जाता है और वहां सूर्यदेव की साक्षी में जलवा पूजन की रस्म पूरी की जाती है।
इस पर्व से श्योपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है। यही कारण है कि केवल श्योपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल होने आते हैं। जिला प्रशासन और पुलिस विभाग की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। जगह-जगह पुलिस बल की तैनाती की गई और ड्रोन से शोभायात्रा की निगरानी भी की गई।
डोल शोभायात्रा के साथ जलझूलनी एकादशी का यह आयोजन न केवल आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बना, बल्कि श्योपुर की गौरवमयी परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को भी एक बार फिर जीवंत कर गया।








