कभी उधार लेते तो कभी जेवर गिरवी रखते…मिड-डे मील खिलाने वाली महिलाओं का दर्द

कभी उधार लेते तो कभी जेवर गिरवी रखते…मिड-डे मील खिलाने वाली महिलाओं का दर्द


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Balaghat News: महिलाएं महीने में करीब 22 से 24 दिन बच्चों के लिए मिड डे मील बनाती हैं. इतने काम के लिए उन्हें सिर्फ 500 रुपये की सैलरी मिलती है. समूह संचालकों का कहना है कि इतनी सी मिलने वाली सैलरी भी मई माह से…और पढ़ें

बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट में न मई से सैलरी आई है और न ही कोई अनाज मिला है. ऐसे में आंगनबाड़ी और स्कूलों में मिड डे मील का संचालन करने वाली स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं उधार लेकर और जेवर गिरवी रखकर काम चला रही हैं. इतना बताते ही समूह चलाने वाली कविता लाड़े भावुक हो जाती हैं. दरअसल प्रधानमंत्री पोषण आहार योजना के तहत शासकीय प्राथमिक, माध्यमिक और आंगनवाड़ी केंद्रों में इसका संचालन होता है. इसकी जिम्मेदारी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली गरीब महिलाओं को दी गई है. ऐसे में उन्हें ही मिड डे मील सांझा चूल्हा योजनाओं के चलाने की जिम्मेदारी मिली है लेकिन उन महिलाओं को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. अब मजबूर होकर वे जिला मुख्यालय कलेक्टर कार्यालय पहुंची और यहां अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा है.

मध्याह्न भोजन योजना के तहत बच्चों को दोपहर का भोजन कराना अनिवार्य होता है. ऐसे में भोजन कराने के लिए जो राशि आती है, उसमें बच्चों की उपस्थिति के मुताबिक ही भुगतान होता है. अगस्त में बच्चों की उपस्थिति सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत थी, इसलिए भुगतान भी इसी के मुताबिक हुआ लेकिन 15 अगस्त को राष्ट्रीय पर्व यानी स्वतंत्रता दिवस भी मनाया जाता है. ऐसे में शासन के निर्देश होते हैं कि इस मौके पर बच्चों को विशेष खाना खिलाना होता है. इस तरह स्कूल के बच्चों के साथ-साथ गांव के लोगों को भी यह खाना खिलाना पड़ा, जिसका भार भी खाना बनाने वाले समूह पर आ गया. अब वे चाहते हैं कि समूह को अलग से राशि का भुगतान किया जाना चाहिए.

इतने काम के लिए सिर्फ 500 रुपये
महिलाएं महीने में करीब 22 से 24 दिन बच्चों के लिए खाना बनाती हैं. इतने काम के लिए उन्हें सिर्फ 500 रुपये की तनख्वाह मिलती है. अब समूह संचालकों का कहना है कि इतनी सी मिलने वाली तनख्वाह भी मई से नहीं मिली है. ऐसे में गरीबी में आटा गीला जैसी स्थिति बन गई है.

काम छोड़ देने की चेतावनी
प्रांतीय स्वयं सहायता समूह रसोईया महासंघ की जिला अध्यक्ष कविता लाड़े का कहना है कि ये काम महिलाओं पर बोझ बन रहा है. कभी उधार लेकर तो कभी गहने गिरवी रखकर काम कर रहे हैं. इससे पहले शासन को समस्या से अवगत करवाया था. अगर अब समस्या का निराकरण नहीं हुआ, तो काम छोड़ फिर से धरने पर बैठा जाएगा.

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