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Chhatarpur News: मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी पुरानी चीजों का घरों में इस्तेमाल होता है. अगर पुरानी चीजों की बात करें तो मथानी, चकरी से लेकर सिकहरा जैसी चीजें आपको देखने को मिल जाएंगी. चलिए इनके बारे में विस्तार जान लेते हैं.
छतरपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी पुरानी चीजें देखने को मिल जाती हैं, जिनका सालों पहले उपयोग होता था. हालांकि, मशीनीकरण के दौर में ये सब चीजें धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं, लेकिन आज भी ग्रामीण इलाकों में ये पुरानी चीजें देखने को मिल जाती हैं.

जब मशीन नहीं होती थी तो दही से छाछ (मट्ठा) और मक्खन निकालने का काम मथानी से ही होता था. गांव में तो सदियों से मक्खन निकालने का काम मथानी से ही होता आया है. आज मशीनीकरण के दौर में भी गांव में मथानी से ही मक्खन निकाला जाता है. हालांकि, शहरों में ये मथानी देखने को नहीं मिलती हैं.

गांव में मथानी बनाने का काम बढ़ई करते थे. इसे लकड़ी से ही बनाया जाता था. मथानी बनाने के लिए एक खास लकड़ी की जरूरत होती है. ये लकड़ी बढ़ई भली भांति जानते थे. मथानी दो प्रकार से बनाई जाती थी. एक छोटी साइज की बनाई जाती थी और एक बड़ी साइज की बनाई जाती थी.

पहले के जमाने में गांव में किसी बड़ी टंकी या पीतल की नांद में दही डालकर मथानी से मक्खन निकाला जाता था. इस मथानी में दो हिस्से होते हैं. पहला हिस्सा जो दही को तोड़ता है. इसे डंडे की सहायता से घुमाया जाता है और डंडे को रस्सी के सहारे इंसान घुमाता है. इसे दांए और बांए दिशा की तरफ घुमाया जाता है.

पहले के जमाने में गांव में गेहूं से आटा निकालने के लिए जतवा या चकरी का इस्तेमाल होता था. ये जतवा और चकरी हर घर में होता था. सुबह-सुबह महिलाएं या पुरुष जतवा चलाकर आटा निकलते थे. जिससे कि वह पूरे दिन फुर्तीले बने रहते थे. बता दें, चकरी और जतवा का काम तो पीसना होता है, लेकिन जतवा साइज में बड़ा होता है. वहीं, चकरी साइज में छोटी होती है. चकरी से चना, अरहर की दाल पीसना और दलिया पीसने का काम आज भी गांवों में होता है.

छतरपुर जिले में इसे कुपरी कहा जाता है, जो तांबे या पीतल की होती थी. इसमें पहले आटा गूंधा जाता था. क्योंकि परिवार के सदस्य ज्यादा होते थे, तो एक बड़े कुपरी का इस्तेमाल होता था. इसके अलावा जब भी घर में लड्डू और पेड़े बनते हैं, तो इसको कुपरी में ही उनको रखा जाता है.

इसे मूसर कहा जाता है, इसका सबसे ज्यादा उपयोग शादी-ब्याह में किया जाता है. जब लड़के की बारात निकलती है तो कुछ ऐसी रस्म भी होती हैं जहां मूसर का ही इस्तेमाल होता है.

इसे सिकहरा या सिकारा कहा जाता है. बिल्लियों और चूहों से बचाने के लिए पहले के घरों में सिकहरा बनाया जाता था, जिसे घरों की छत से टांगकर रखा जाता था. पुराने जमाने में फ्रिज नहीं होते थे तो रोटी, सब्जी और दूध जैसी चीजें यहीं रखी जाती थीं. इसके अलावा कूंड़ा भी होता था, जिसे जमीन में रखा जाता था. इसी के भीतर रोटी, सब्जी और दूध दही सुरक्षित रख दिया जाता था.

मिट्टी का चूल्हा जो आज भी गांवों में देखने को मिल जाता है. गांव में 12 महीने मिट्टी के चूल्हे में भोजन बनाया जाता है. ठंड में तो सबसे ज्यादा उपयोग मिट्टी के चूल्हे का होता है. गांव के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे में ही खाना बनाना पसंद करते हैं. गांव के पुराने बुजुर्ग आज भी मिट्टी के चूल्हे में ही भोजन बनवाते हैं. उन्हें गैस स्टोव में बना खाना पसंद नहीं आता है.