भोपाल में रविवार को राष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन आयोजित किया गया।
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यह कहना है एलएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. डीपी सिंह का। उन्होंने कहा कि नए डॉक्टरों में मरीजों के प्रति स्नेह और मानवीय व्यवहार की कमी दिखने लगी है। मरीज और उनके परिजनों में भी धैर्य की कमी है। जिससे अस्पतालों में विवाद की घटनाएं बढ़ी हैं।
दरअसल, भोपाल में 14 सितंबर को राष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिस चर्चा के लिए ‘आधुनिक चिकित्सा: चुनौतियां और समाधान’ पर देशभर के 100 डॉक्टर, रिसर्चर और स्पेशलिस्ट शामिल हुए थे। विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि लोगों को विटामिंस और मिनरल्स दवाओं के तौर पर लेने पड़ रहे हैं। इससे एक हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार सिर्फ विटामिन, मिनरल और न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स हो गया है।
इस दौरान विशेषज्ञों ने डॉक्टरों की नई पीढ़ी की चुनौतियों पर भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कई तरह के बैक्टीरिया को खत्म करने में असरदार मेरोपेनम, पेनिसिलिन, अमॉक्सीसिलिन जैसी दवाएं अब आईसीयू में भी बेअसर साबित हो रही है। जबकि कभी बेअसर साबित हो चुकी सेपटोन और क्लोरोफेनिकोल अब दोबारा असर दिखाने लगी है। जिससे उन्हें डॉक्टर लिखने लगे हैं।
इसलिए दवाएं हो रहीं बेअसर डॉ. डीपी सिंह ने बताया- एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बैक्टीरिया से होने वाले इन्फेक्शन के इलाज में होता है। यह बैक्टीरिया के स्ट्रक्चर और फंक्शन को टारगेट करती हैं। लेकिन शरीर में बार बार एंटीबायोटिक पहुंचने से शरीर में दवा के प्रति ही एंटी रजिस्टेंस पैदा हो जाता है।
जिससे दवा का असर खत्म हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि आम लोगों के साथ अस्पतालों में भी एंटीबायोटिक पॉलिसी का सख्ती से पालन हो। डब्लूएचओ के अनुसार एएमआर के चलते हर साल 50 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यही हाल रहा तो साल 2050 तक मौत का आंकड़ा 1 करोड़ के पार चला जाएगा।
चिकित्सा जगत के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि पिछले 30 साल में नई एंटीबायोटिक्स की केवल दो ही क्लास सामने आई हैं। यानी मरीजों के इलाज के लिए विकल्प बेहद सीमित हैं।
डॉ. डीपी सिंह ने कहा कि आईसीयू में जब गंभीर मरीज भर्ती होते हैं, तो हमारे पास आधुनिक उपकरण और इलाज की व्यवस्था होती है। लेकिन जब दवा ही असर न करे तो मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है।

तालमेल की कमी से मरीजों का भरोसा टूटा इंदौर से आए थायरॉइड, डायबिटीज और ओबेसिटी स्पेशलिस्ट डॉ. राजेश अग्रवाल ने कहा कि आज मेडिसिन से जुड़ी ढेरों रिसर्च हो रही हैं, लेकिन इनका लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा। एक ओर इन रिसर्च के आधार पर पूरा भरोसा कर इलाज किया जा रहा है, तो दूसरी ओर कई बार इन्हें लागू ही नहीं किया जाता।
इस असमानता से मरीजों का डॉक्टरों पर भरोसा कम हो रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि रिसर्च के परिणामों का पूरा आकलन कर सर्वसम्मति से इन्हें लागू किया जाए।

एक हजार करोड़ की सिर्फ विटामिन, मिनरल और न्यूट्रिशनल दवा का कारोबार डॉ. अग्रवाल ने कहा कि आज लगभग हर व्यक्ति न्यूट्रिशनल डेफिशिएंसी से जूझ रहा है। हमारी थाली में आने वाले फल और सब्जियां दिखने में भले ही खूबसूरत और साफ हों, लेकिन लंबे स्टोरेज, पेस्टीसाइड और केमिकल की वजह से उनके अंदरूनी पोषक तत्व कम हो गए हैं।
यही कारण है कि अब हमें विटामिंस और मिनरल्स दवाओं के रूप में लेने पड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक नई रिपोर्ट से सामने आया कि मप्र और छत्तीसगढ़ में हर साल 10 हजार करोड़ से ज्यादा की दवाएं खरीदी जाती हैं।
जिसमें एक हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार सिर्फ विटामिन, मिनरल और न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स का है।
तनाव बना हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट की वजह कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुब्रोतो मंडल ने बताया कि आज के समय में सडन कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक बिना किसी स्पष्ट कारण के सामने आ रहे हैं। कई मरीज आधे घंटे पहले तक पूरी तरह स्वस्थ दिखते हैं और अचानक मौत हो जाती है।
स्टडी में सामने आया है कि इसकी एक बड़ी वजह तनाव है। व्यक्ति अंदर से तनाव से गुजर रहा होता है, लेकिन इसे बाहर से देखकर पहचान पाना संभव नहीं होता। शुगर या बीपी की तरह तनाव को मापने की कोई जांच भी उपलब्ध नहीं है।

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मैं न सिगरेट पीता हूं न ही शराब…जिम में एक्सरसाइज भी करता हूं, साथ में खाने का भी विशेष ध्यान रखता हूं। फिर मुझे हार्ट अटैक क्यों आया? यह सवाल हमीदिया अस्पताल के आईसीयू में भर्ती 30 साल के राहुल (बदला हुआ नाम) का है। राहुल ने यह सवाल कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा से किया है। पढ़ें पूरी खबर