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Kuno National Park News: कूनो नेशनल पार्क की मादा चीता ‘मुखी’ की हर ओर चर्चा है. मां के त्याग और भाई-बहनों की मौत जैसी दुखद घटनाओं के बावजूद मुखी ने हार नहीं मानी. अब मुखी प्रोजेक्ट चीता की ‘पोस्टर गर्ल’ कहलाती है.
भारत में चीतों की वापसी को लेकर चल रहा प्रोजेक्ट चीता कई मायनों में खास है. 70 साल बाद जब चीतों को भारत लाया गया, तो 29 मार्च 2023 को जन्मी मुखी की कहानी अलग ही पहचान बनाने लगी. मुखी, नामीबिया से आई मादा ज्वाला और नर शौर्य की संतान है.

गर्मी की भीषण लहर में मुखी के भाई-बहन मर गए और मां ज्वाला ने भी उसे छोड़ दिया. उस वक्त सबको लगा कि मुखी भी जिंदा नहीं रह पाएगी. लेकिन, उसने उम्मीदों को तोड़ते हुए जीवन की लड़ाई जीत ली और खुद को साबित किया.

23 मई 2023 को जब टीम ने मुखी को कमजोर और थका हुआ पाया, तब उसे मेडिकल निगरानी में रखा गया. सख्त नियमों और कड़ी सावधानियों के साथ उसकी देखभाल शुरू की गई. धीरे-धीरे उसने ताकत पाई और जीवन की राह पर आगे बढ़ने लगी.

कूनो नेशनल पार्क के पशु चिकित्सकों और फील्ड स्टाफ ने मुखी की देखभाल में दिन-रात मेहनत की. कई बार उसे मां ज्वाला से मिलाने की कोशिश भी की गई, लेकिन ज्वाला ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया. इसके बाद मुखी को अकेले ही जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

इलाज और देखभाल के बाद जब मुखी ने खुद शिकार करना सीखा, तो यह टीम के लिए बड़ी उपलब्धि रही. उसने यह साबित कर दिया कि कठिन हालात में भी संघर्ष से सफलता हासिल की जा सकती है.

प्रोजेक्ट चीता के फील्ड डायरेक्टर उत्तम शर्मा ने मुखी को “साहस और आशा का प्रतीक” बताया. उनका कहना है कि मुखी की कहानी ने प्रबंधकों, पशु चिकित्सकों और फील्ड स्टाफ को भी नई ताकत दी है.

उन्होंने कहा कि जीवित प्राणियों के साथ काम करने में हमेशा जोखिम रहता है. मुखी की कहानी से सबसे बड़ा सबक यही है कि कभी हार नहीं माननी चाहिए. इस अनुभव ने चीता प्रबंधन के हर पहलू को और गहराई से समझने का अवसर दिया.

आज मुखी भारत में जन्मे 17 शावकों में सबसे अलग पहचान बना चुकी है. अकेलेपन और कठिनाइयों में उसका सफर उसे प्रोजेक्ट चीता की ‘पोस्टर गर्ल’ बना चुका है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा की मिसाल है.