हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में डबल बेंच ने एक पुलिस आरक्षक के बर्खास्त केस की सुनवाई करते हुए आरक्षक की ओर से बहाल करने की याचिका को खारिज कर दिया है। 18 साल पहले एक बंगले पर ड्यूटी के दौरान वह निरीक्षण में शराब के नशे में सोते हुए मिला था।
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जिसके बाद डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर उसे बर्खास्त किया गया था। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि पुलिस आरक्षक यदि नशे में ड्यूटी करता है तो यह कानून-व्यवस्था के लिए खतरनाक है। इतना ही नहीं ड्यूटी पर पुलिस कर्मियों की सोशल मीडिया की लत को भी ड्यूटी में लापरवाही की जड़ मानकर डबल बेंच ने कमेंट किया है।
हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ।
यह है पूरा मामला पुलिस विभाग में बतौर आरक्षक पदस्थ रहे याचिकाकर्ता अशोक कुमार त्रिपाठी साल 2007 में एक बंगले पर सुरक्षा में तैनात थे। चार अगस्त 2007 की सुबह 6.30 बजे जब अधिकारी निरीक्षण के लिए पहुंचे तो इस दौरान आरक्षक सोते हुए नजर आया। जब उसे जगाया गया तो वह नशे में प्रतीत हुआ था।
उसे तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर मेडिकल कराया गया था। डॉक्टर ने भी जांच के बाद विभागीय जांच में स्टेटमेंट दिया था कि आरक्षक की सांस में शराब की गंध पाई गई है। इसके बाद पुलिस अफसरों ने उसे बर्खास्त किया था। इसके बाद पुलिस आरक्षक ने कोर्ट का रुख किया था। कोर्ट ने क्या कहा? इस मामले में याचिकाकर्ता आरक्षक अशोक कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डबल बेंच ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी है कि पुलिस जवान ड्यूटी के दौरान नशे में पाया गया था। पुलिस वर्दी में रहते हुए नशा करना गंभीर अनुशासनहीनता है। ऐसे व्यक्ति के साथ कोई भी सहानुभूति नहीं दिखाई जानी चाहिए। सोशल मीडिया को भी लापरवाही के लिए माना जिम्मेदार इसी मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि आज कल देखने में आया है कि नशे के साथ-साथ ड्यूटी में लापरवाही की वजह सोशल मीडिया की लत भी दिखाई पड़ती है। इसलिए पुलिस विभाग को चाहिए कि ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मी सोशल मीडिया की लत में न आएं इसके लिए एक निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए।