किसकी है काली पुतली चौक पर लगी मूर्ति? जानें कैसे पड़ा शहर का नाम ‘बालाघाट’

किसकी है काली पुतली चौक पर लगी मूर्ति? जानें कैसे पड़ा शहर का नाम ‘बालाघाट’


Last Updated:

Balaghat News: इतिहासकार वीरेंद्र सिंह गहरवार ने लोकल 18 से कहा कि बाला मड़ावी नाम की महिला का नाम इतिहास में दर्ज नहीं है. वहीं काली पुतली चौक पर स्थित मूर्ति की स्थापना 1973 में हुई थी.

बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट शहर का सबसे अहम चौराहा काली पुतली चौक है. जब भी लोग बालाघाट आते हैं, तो वे काली पुतली चौक जरूर जाते हैं. काली पुतली चौक को शहर का हार्ट कहा जा सकता है लेकिन बीते कुछ दिनों से यह चौक विवादों में आ गया है. दरअसल नगरपालिका इसी इलाके में भारत माता की प्रतिमा स्थापित करना चाहती है. आदिवासी संगठनों को आशंका थी कि काली पुतली के स्थान पर भारत माता की प्रतिमा स्थापित कर दी जाएगी लेकिन आदिवासी समुदाय के लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं, जानते हैं लोकल 18 की इस खास रिपोर्ट में.

बालाघाट नगरपालिका ने भारत माता की प्रतिमा की स्थापना का ऐलान किया था. ऐसे में आदिवासी संगठनों को आशंका थी कि काली पुतली चौक स्थित प्रतिमा को हटाकर भारत माता की प्रतिमा स्थापित की जाएगी. साथ ही उन्हें यह भी संदेह था कि काली पुतली चौक का नाम बदलकर भारत माता चौक रखा जाएगा. हालांकि विरोध के स्वर उठने से पहले ही नगरपालिका अध्यक्ष भारती ठाकुर से स्पष्ट कर दिया कि काली पुतली चौक पर स्थित प्रतिमा यथावत रहेगी.

क्या है आदिवासी संगठन का दावा?
आदिवासी महिला नेत्री हीरासन उइके का दावा है कि जिले के काली पुतली चौक पर स्थित प्रतिमा गोंड वंश की बाला मड़ावी नाम की बिटिया की है, जो 12 घाटों से पानी लाती थी. ऐसे में उन्हीं के नाम पर शहर का नाम साल 1888 में बूढ़ा-बूढ़ी से बदलकर बालाघाट नाम रखा गया. अब आदिवासी संगठन चाहता है कि काली पुतली चौक को बाला चौक के नाम से जाना जाए और एक बोर्ड भी लगाया जाए.

दावे से अलग है इतिहास
इतिहासकार वीरेंद्र सिंह गहरवार से बातचीत में पता चला कि बाला मड़ावी नाम की महिला का नाम इतिहास में दर्ज नहीं है. वहीं काली पुतली चौक पर स्थित प्रतिमा की स्थापना साल 1973 में हुई थी. तब के नगरपालिका अध्यक्ष इंदरचंद चतुरमोहता ने सौंदर्यीकरण के उद्देश्य से काली पुतली प्रतिमा की स्थापना की थी. तब से लेकर अब तक इस चौक को काली पुतली चौक के नाम से ही जाना जाता है.

बूढ़ा से बालाघाट का सफर
बालाघाट का गठन साल 1867 में हुआ था. इसका मुख्यालय बूढ़ा या बुरा कहलाता था. बालाघाट जिले की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक बालाघाट नाम की उत्पत्ति के पीछे पहाड़ी मार्गों को माना जाता है. दरअसल यहां मुख्य तौर पर 12 घाट थे. ऐसे में जिले का नाम बारहघाट प्रस्तावित किया गया था लेकिन बाद में उच्चारण के दौरान बालाघाट बन गया.

इससे पहले हो चुकी है कोशिश
निर्दलीय नगरपालिका अध्यक्ष अनुभा मुंजारे के कार्यकाल में काली पुतली चौक का नाम बदलकर शहीद भगत सिंह चौक रखने का प्रयास किया गया था, तब भी आदिवासी संगठनों के विरोध के बाद भगत सिंह की प्रतिमा को जिला अस्पताल में स्थापित करना पड़ा था.

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

न्यूज़18 हिंदी को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
homemadhya-pradesh

किसकी है काली पुतली चौक पर लगी मूर्ति? जानें कैसे पड़ा शहर का नाम ‘बालाघाट’



Source link