‘नवंबर 2021 में दीपावली के अगले दिन की बात है। भैया को सीने में दर्द हुआ। हम उन्हें लेकर अस्पताल भागे, रास्ता मुश्किल से 5 मिनट का है, लेकिन बीच में रेलवे फाटक बंद था। मैं तड़प रहे भैया को दिलासा दे रहा था, पर एक के बाद एक तीन ट्रेनें निकलीं और फाटक
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यह कहते हुए अनूपपुर के छोटू चौधरी का गला भर आता है। उनके भाई की जान उस रेलवे फाटक ने ले ली, जिस पर ओवरब्रिज बनाने का काम पिछले 8 सालों से चल रहा है। यह सिर्फ छोटू की कहानी नहीं है, बल्कि कोयला खदानों के कारण दो हिस्सों में बंटे इस शहर की हजारों कहानियों का साझा दर्द है।
जिस ओवरब्रिज को 24 महीने में बनना था, वह 84 महीने बाद भी अधूरा है और अब यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और अनगिनत त्रासदियों का प्रतीक बन चुका है। दैनिक भास्कर ने मौके पर पहुंचकर लंबे समय से अटके इस प्रोजेक्ट की हकीकत जानी।
कहानी 1: ‘फाटक खुला होता तो भैया जिंदा होते’ छोटू चौधरी उस रात को कभी नहीं भूल सकते। उनके भाई की जान बचाई जा सकती थी, अगर वे समय पर अस्पताल पहुंच जाते। वे कहते हैं, ‘हम गेटमैन से गुहार लगाते रहे, पर वह रेलवे कानून की दुहाई देता रहा। अगर यह ब्रिज बन गया होता, तो आज हमारे भैया हमारे साथ होते। पता नहीं और कितने मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ेंगे।’

पिछले 8 साल से लोग पटरी पार कर एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।
कहानी 2: ‘रात भर पटरी पर पड़ी रही मेरे बेटे की लाश’ शहर के शंकर तिवारी का बेटा चंचल एक प्रतिभाशाली क्रिकेटर था। 2008 की एक शाम वह पटरियां पार कर रहा था कि ट्रेन की चपेट में आ गया। तिवारी कहते हैं, ‘कुछ समय बाद रेलवे पुलिस के दो जवान मेरे घर आए।’ उन्होंने कहा, ‘तिवारी जी आपका बेटा कहां है?’ मैंने कहा, ‘खेलने गया है।’ वे बोले, ‘पटरी के पास एक बॉडी पड़ी है, चलकर शिनाख्त कर दीजिए’।
मैं रास्ते भर भगवान को मनाते हुए जा रहा था, प्रभु मेरी लाज रख लो वह चंचल न हो… लेकिन क्या हो सकता था, मैं मौके पर पहुंचा…(फफकने लगते हैं) मेरा बेटा जा चुका था, रात भर लाश पटरियों के पास पड़ी रही।मेरे बेटे के जाने के बाद भी क्या बदला? आज भी यह ब्रिज नहीं बना है।

कहानी 3: ‘ब्रिज से गिरी रॉड, पत्नी के सिर में आए 8 टांके’ यह अधूरा ब्रिज अब लोगों के लिए जान का खतरा बन गया है। रिटायर्ड एसआई उदयशंकर पासवान बताते हैं, ‘मार्च 2023 में मैं पत्नी के साथ मोटरसाइकिल से जा रहा था। फाटक के पास से गुजरते समय ऊपर ब्रिज से एक लोहे की रॉड सीधे मेरी पत्नी के सिर पर गिरी। उसका सिर फट गया और आठ टांके आए। आज भी उसे सिर में दर्द होता है।’

ब्रिज पर पड़ा सामान भी लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है।
कहानी 4: ‘सात लोगों का स्टाफ था अब 1 लड़का बचा’ रेलवे फाटक के पास होटल चलाने वाले मोनू अग्रवाल का कारोबार ठप हो चुका है। वे कहते हैं, ‘मेरा यह होटल है पहले यह अच्छा चलता था। सात लोगों का स्टाफ था, लेकिन अब देखिए मात्र एक कमरा भरा है। काम करने के लिए एक लड़का रह गया है। जब यहां कोई आता ही नहीं तो मतलब क्या है स्टाफ रखने का? मोनू कहते हैं जब यहां रास्त ही नहीं बचा तो कोई निकलेगा कैसे?

15 मजदूर ब्रिज बना रहे, निर्माण की सुस्त रफ्तार अनूपपुर स्टेशन से 500 मीटर दूर ही यह अधूरा ब्रिज नजर आ जाता है। यहां हर पांच मिनट में एक मालगाड़ी गुजरती है। जब हमारी टीम पहुंची, तो पूरे 504 मीटर लंबे ब्रिज पर कुल जमा 15 मजदूर काम कर रहे थे। एक तरफ जेसीबी और 5-7 मजदूर, तो दूसरी तरफ कुछ वेल्डर और हेल्पर।
इसी दौरान एसडीएम कमलेश पुरी निरीक्षण करने आए और साइट इंजीनियर को काम में तेजी लाने का निर्देश देकर चले गए। जब भास्कर की टीम ने साइट मैनेजर श्रवण विश्वकर्मा से देरी का कारण पूछना चाहा, तो वे झल्लाते हुए बोले, ‘फालतू बात मत कीजिए, मेरे पास समय नहीं है। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।’ यह जवाब बताता है कि निर्माण एजेंसी और ठेकेदार कितने गैर-जिम्मेदार हैं।

ब्रिज पर केवल 15 मजदूर काम कर रहे हैं। एसडीएम ने ठेकेदार को मजदूरों की संख्या बढ़ाने को कहा।
देरी की वजह- मुआवजे और राजनीति का खेल यह ब्रिज अनूपपुर की जीवनरेखा है। शहर का एक हिस्सा (जिला अस्पताल, स्कूल) पटरी के दक्षिण में है, तो दूसरा (बाजार, कलेक्ट्रेट, थाने) उत्तर में। कोयला खदानों के कारण यहां से रोज 100 से ज्यादा माल गाड़ियां गुजरती हैं, जिससे फाटक दिन में 16 घंटे तक बंद रहता है।
डेढ़ दशक की मांग: साल 2003 से ही ब्रिज बनाने की मांग उठ रही थी। 2007 में बड़े जनआंदोलन के बाद एक अंडरब्रिज बना, लेकिन वह 2 किलोमीटर दूर होने के कारण अनुपयोगी साबित हुआ।
मुआवजे का विवाद: साल 2015 में सीएम की घोषणा के बाद 2017 में काम शुरू हुआ, लेकिन मुआवजे को लेकर विवाद खड़ा हो गया। राजस्व विभाग की गलती के कारण सरकारी जमीन पर लोगों ने मुआवजा मांग लिया। पहले 9 करोड़, फिर समीक्षा के बाद 7 करोड़ का मुआवजा बांटा गया। इसके बाद कुछ लोगों ने जमीन पर लगे काजू और गुलाब के पेड़ों का भी मुआवजा मांग लिया, जिससे काम और अटक गया।
घट गई चौड़ाई: राजनीतिक दबाव के चलते ब्रिज की चौड़ाई 90 फीट से घटाकर 65 फीट कर दी गई, जिससे डिजाइन में बदलाव हुआ और देरी हुई।

ट्रेन के सामने से पटरी पार करने को मजबूर बच्चे।
एसडीएम बोले, 3 महीने में पूरा हो जाएगा ब्रिज ब्रिज कब पूरा होगा? इस सवाल के जवाब में एसडीएम कमलेश पुरी बोले- ठेकेदार को काम दिया गया था, वह पूरा नहीं हो पाया है। पहले मुआवजा वितरण फिर अतिक्रमण के चलते देरी हुई। वर्तमान में इसकी लगातार मॉनिटरिंग चल रही है। मैं रोजाना यहां आता हूं, कलेक्टर साहब भी लगातार निरीक्षण करते हैं।
सितंबर में इसे पूरा हो जाना था, लेकिन मौसम के कारण कुछ देरी हुई है। अभी ओवरब्रिज का आर्च बन गया है, उसे शिफ्ट किया जा रहा है, बिलासपुर जोन से पिलर्स मंगाए हैं।
