100 साल से खनक रहा खंडवा बर्तन बाजार, अंग्रेजों के जमाने से चमक अब भी बरकरार

100 साल से खनक रहा खंडवा बर्तन बाजार, अंग्रेजों के जमाने से चमक अब भी बरकरार


खंडवा. दीवाली का त्योहार आते ही हर शहर, हर बाजार रौनक से भर जाता है लेकिन जब बात आती है मध्य प्रदेश के खंडवा के ऐतिहासिक घंटाघर चौक की, तो यहां का बर्तन बाजार अपनी अलग ही पहचान रखता है. यह सिर्फ एक बाजार नहीं बल्कि 100 साल पुरानी परंपरा की खनक है, जो आज भी गूंज रही है. अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही यह मार्केट आज भी उतनी ही चमकदार और जीवंत है, जितनी पहले थी. यहां के पुराने व्यापारी बताते हैं कि यह बाजार करीब 100 साल पुराना है. धनतेरस-दीवाली में जब हर घर में नए बर्तन खरीदने की परंपरा निभाई जाती है, तब घंटाघर चौक का यह बाजार जगमगाने लगता है. इस बार भी कारोबारी उम्मीद कर रहे हैं कि दीवाली तक 70 से 80 लाख रुपये का कारोबार होगा.

बर्तन बाजार में इस बार तांबा, पीतल और स्टील के बर्तनों की नई वैरायटी आई है. पहले जहां सिर्फ साधारण बर्तन बिकते थे, अब डिजाइनर बर्तनों की मांग बढ़ी है. घड़े, लोटे, गिलास, कड़ाही, थाल और बोतलों के डिजाइन अब पहले से कहीं ज्यादा आकर्षक हो गए हैं. खास बात यह है कि अब तांबे के लोटे और पीतल के बर्तनों की डिमांड दोबारा बढ़ रही है क्योंकि लोग फिर से पारंपरिक धातुओं की ओर लौट रहे हैं.

स्टील और डिजाइनर आइटम्स ने ली जगह
समाजसेवी सुनील जैन लोकल 18 को बताते हैं कि उनके परिवार की यह तीसरी पीढ़ी इस बाजार को चला रही है. वह कहते हैं, ‘हमारे दादाजी के जमाने से यह बाजार दीवाली पर सजता है. पहले यहां मिट्टी के और तांबे के बर्तन बिकते थे, अब स्टील और डिजाइनर आइटम्स ने जगह ले ली है लेकिन हमारी मेहनत और ग्राहकों का विश्वास वही पुराना है.’

किसान ही इस बाजार की रीढ़
हालांकि इस साल बाजार की रौनक कुछ फीकी नजर आ रही है. व्यापारी बताते हैं कि किसानों की खराब फसल ने खरीदारी पर असर डाला है. निमाड़ क्षेत्र के कई किसान इस बार नुकसान में हैं, जिससे उनकी खरीदने की क्षमता घटी है. चूंकि किसान ही इस बाजार की रीढ़ हैं, इसलिए उनका संकट पूरे बाजार पर असर डाल रहा है. बाजार में रोजाना सैकड़ों लोग खरीदारी करने आ रहे हैं लेकिन बीते वर्षों की तरह भीड़ नहीं है. बावजूद इसके दुकानदार उम्मीद नहीं छोड़ रहे हैं. उनका मानना है कि जैसे-जैसे दीवाली नजदीक आएगी, भीड़ बढ़ेगी और रौनक लौट आएगी.

परंपरा, रिश्तों और विश्वास की कहानी
घंटाघर चौक का यह बाजार सिर्फ कारोबार का केंद्र नहीं बल्कि परंपरा, रिश्तों और विश्वास की कहानी भी कहता है. यहां आने वाला हर ग्राहक सिर्फ बर्तन नहीं खरीदता बल्कि उस इतिहास का हिस्सा बनता है, जो 100 सालों से यहां जीवित है. आज भी जब शाम ढलती है और दुकानों की लाइटें जगमगाने लगती हैं, तो बाजार में वही पुरानी खनक सुनाई देती है, जैसे वक्त थम गया हो और इतिहास खुद दीवाली की खुशियों में शामिल हो गया हो. दुकानदारों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बाजार फिर से अपनी पुरानी चमक पाएगा. आखिर दीवाली पर नया बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है और जब परंपरा इतनी पुरानी हो, तो उसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती.



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