दिवाली का त्योहार आते ही बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, लाइट्स और सजावट की चीजों से रोशनी फैल जाती है. लेकिन इस बार एक अलग ही चमक देखने को मिल रही है अब बाजारों में गोबर से बने दीये छा गए हैं. जी हां! वो गोबर जो पहले सिर्फ ईंधन या खाद के काम आता था, अब दिवाली की नई पहचान बन चुका है.
गोबर के दीयों की बढ़ती लोकप्रियता
गांवों की महिलाएं और युवा अब इस “गोबर क्रांति” को आत्मनिर्भरता के नए रूप में देख रहे हैं. भोपाल के पास रहने वाले लव जोशी बताते हैं कि अब लोग गांव और शहर दोनों जगह अपने घरों में ही गोबर के दीये बनाना सीख रहे हैं. इससे न सिर्फ रोज़गार बढ़ रहा है बल्कि प्रदूषण भी घट रहा है. दीयों को बनाने में ना बिजली की ज़रूरत, ना मशीनों की बस गाय का गोबर, थोड़ा भूसा और धूप.
क्यों खास हैं गोबर के दीये?
गोबर से बने दीयों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इनसे कोई हानिकारक धुआं नहीं निकलता. दीपावली के बाद ये मिट्टी में मिलकर जैविक खाद बन जाते हैं और भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं. गोबर में मौजूद एंटीबैक्टीरियल तत्व घर के वातावरण को शुद्ध करते हैं. जब इन दीयों में घी या सरसों का तेल जलाया जाता है, तो पूरे घर में एक दिव्य सुगंध और सकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है.
घर पर गोबर के दीये कैसे बनाएं?
सामग्री:
गाय का गोबर, गेहूं का भूसा, पानी, सांचा (या हाथ से आकार देने की कला)
विधि:
गोबर को पानी के साथ गूंथ लें.
उसमें थोड़ा भूसा मिलाएं ताकि दीया मजबूत बने.
हाथ से या सांचे से दीयों का आकार दें.
2-3 दिन धूप में सुखाएं.
सूखने के बाद चाहें तो हल्दी या नेचुरल रंग से सजाएं.
अब आपका इको-फ्रेंडली दिया तैयार है!
रोजगार का नया ज़रिया
ग्रामीण महिलाएं अब इन दीयों को बाजारों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेच रही हैं. एक दीया 30–50 पैसे में बनता है और 2 से 5 रुपये तक बिकता है. कई स्वयं सहायता समूह (SHGs) इस कार्य से जुड़ चुके हैं. यह सिर्फ दिवाली की तैयारी नहीं, बल्कि गांवों में रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है.
दिवाली का असली संदेश
दिवाली रोशनी, खुशहाली और सकारात्मकता का पर्व है. इस बार अगर आप गोबर या मिट्टी के दीयों से घर सजाते हैं, तो यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि धरती मां के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है.