गोवर्धन धाम मंदिर में विराजे भगवान श्रीकृष्ण।
सागर के तिली क्षेत्र में मराठाकालीन 300 साल पुराना गोवर्धन धाम मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण बाल स्वरूप में अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत लिए हुए विराजे हैं। यहां दीपावली त्योहार पर प्रसिद्ध श्री देव गोवर्धन धाम मंदिर परिसर में दो दिवसी
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1994 में हुआ था भव्य मंदिर का निर्माण यह मंदिर सागर के तिली क्षेत्र में गवर्नमेंट जिला आयुर्वेदिक हॉस्पिटल के पास स्थित है। मंदिर के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने वाले परिवार के मोहन यादव बताते हैं कि श्रीदेव गोवर्धन धाम मंदिर 300 साल से अधिक पुराना मराठाकालीन है। अंग्रेज शासनकाल और वन विभाग के रिकॉर्ड में भी मंदिर के संबंध में उल्लेख किया गया है। पहले यहां घने जंगल के बीच एक छोटी सी मढ़िया थी। लेकिन बाद में वर्ष 1993 में यहां भव्य मंदिर का निर्माण शुरू कराया गया। वर्ष 1994 में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ और मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित की गई।
100 साल पुराना है मेला, गाते हैं दीवारी इस मंदिर में दीपावली के दूसरे दिन से दो दिवसीय मेला लगता है। यह मेला भी करीब 100 साल पुराना है। मेले की खासियत यह है कि यहां मौनिया पहुंचते हैं। यह मंदिर उनका मुख्य पूजा स्थल माना जाता है। यहां वे भगवान के दर्शन कर पूजा करते हैं और मौनिया नृत्य की प्रस्तुति देते हैं। वहीं, लोग ‘दीवारी’ (लोकगीत) भी गाते हैं।
अंगुली पर गोवर्धन पर्वत लिए विराजे हैं भगवान गोवर्धन धाम मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की बाल स्वरूप प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा में भगवान अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए हैं। उनका यह आकर्षक रूप निहारने के लिए जिलेभर के भक्त दीपावली के दूसरे दिन और गोवर्धन पूजन के दिन पहुंचते हैं। यहां लोग परिवार के साथ पहुंचकर भगवान के दर्शन कर अपनी मनोकामना मांगते हैं।
गोवर्धन धाम मंदिर।
श्रीकृष्ण का मौन तोड़ने के बाद से शुरू हुई मौनिया परंपरा मौनिया नृत्य बुंदेलखंड का एक लोक नृत्य है। लोगों के मौन होकर इस नृत्य को करने के कारण इसका नाम मौनिया नृत्य पड़ा है। जानकार मोहन यादव बताते हैं कि मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे थे, तभी उनकी गायें कहीं चली गईं। गायों के जाने पर वह दुखी होकर मौन हो गए। इसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे। ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर आए, तब जाकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मौन तोड़ा था।
मौन व्रत रख 12 गांवों की परिक्रमा करते हैं तभी से मौनिया बनने और मौनिया नृत्य की परंपरा शुरू हुई। इस परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के भक्त और गाय चराने वाले (ग्वाल) मौन व्रत रख कर दीपावली के एक दिन बाद ‘मौन परमा’ के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गांवों की परिक्रमा लगाते हैं। इस दौरान वह गांवों के मंदिरों में पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हैं और साथ ही गोवर्धन धाम मंदिर भी आते हैं।

मंदिर परिसर में मेले होगा आयोजित।
बुंदेलखंड का सबसे प्राचीन नृत्य है मौनिया बुंदेलखंड के लोक नृत्यों में से एक मौनिया नृत्य है। मौनिया नृत्य बुंदेलखंड में यादव (अहीर) जाति द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से यह नृत्य दीपावली के दूसरे दिन किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष अपनी पारंपरिक पोशाक पहनकर और मोर के पंखों को लेकर एक घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। बुंदेलखंड का सबसे प्राचीन नृत्य मौनिया है, जो बुंदेलखंड के गांव-गांव में किया जाता है।
मेले की तैयारियां शुरू, झूले-दुकानें लगने लगीं दीपावली के दूसरे दिन से गोवर्धन धाम मंदिर पर लगने वाले दो दिवसीय मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। मंदिर के नीचे खाली पड़े मैदान में मेला लगाया जा रहा है। यहां झूला और अन्य दुकानें लगना शुरू हो गई हैं। मेले में सैकड़ों लोग पहुंचेंगे और भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करने के बाद मेले का लुत्फ उठाएंगे।