न अपना-ना पराया… इंसानियत ही है सबसे बड़ा रिश्ता, खंडवा की संस्था दे रही उन लोगों को विदाई, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं

न अपना-ना पराया… इंसानियत ही है सबसे बड़ा रिश्ता, खंडवा की संस्था दे रही उन लोगों को विदाई, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं


खंडवा. कहते हैं- जीवन का अंत चाहे जैसा भी हो, पर अंतिम यात्रा सम्मान की होनी चाहिए, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि किसी के जाने के बाद उसके पीछे न कोई परिवार होता है, न रिश्तेदार, न कोई दोस्त या जानने वाला. ऐसे में उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार कौन करे? कौन उसे आग की लपटों में मुक्त करे? इन्हीं सवालों का जवाब है खंडवा की एक अनोखी संस्था पूर्व निमाड़ सामाजिक सांस्कृतिक सेवा समिति, जो पिछले 15 सालों से इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल पेश कर रही है.

इस संस्था का काम सुनकर हर किसी की आंखें भर आती हैं. यह ग्रुप उन शवों का अंतिम संस्कार करता है जिनका इस दुनिया में कोई नहीं होता. चाहे सड़क हादसे में अज्ञात व्यक्ति हो, या वृद्धाश्रम में बेसहारा बुजुर्ग  यह संस्था हर किसी के लिए परिवार बन जाती है. उनका विश्वास है- मृत्यु में भी किसी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए.

सूचना मिलने पर तुरंत पहुंची है टीम
इस संस्था के सदस्य किसी रिश्ते या लाभ के लिए नहीं, बल्कि मानवता के नाम पर यह सेवा करते हैं. जब उन्हें किसी लावारिस शव की सूचना मिलती है, तो तुरंत टीम वहां पहुंचती है. वे न केवल शव को सम्मानपूर्वक ले जाते हैं, बल्कि पूरी धार्मिक विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार करते हैं जैसे अपने ही परिजन का करते हैं. कोई फूल चढ़ाता है, कोई लकड़ियां लगाता है, तो कोई ‘राम नाम सत्य है’ की गूंज के साथ उस व्यक्ति को अंतिम विदाई देता है.

आज लोग करते सलाम
संस्था के सदस्यों का कहना है कि शुरुआत में लोग उन्हें अजीब निगाहों से देखते थे. कोई कहता- “अरे, ये तो मुर्दों का काम करते हैं” लेकिन आज वही लोग इस संस्था के काम को सलाम करते हैं. कई बार तो प्रशासन भी इनकी मदद लेता है. जब किसी अज्ञात शव की पहचान नहीं होती, तो यह ग्रुप बिना किसी हिचक के आगे आता है और पूरी मर्यादा के साथ अंतिम संस्कार करता है.

संस्था के प्रमुख भूपेंद्र चौहान बताते हैं कि यह काम केवल सेवा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गया है. उनका कहना है- हम मानते हैं कि हर व्यक्ति को मौत के बाद सम्मान मिलना चाहिए. यह उसका हक है, चाहे उसका इस दुनिया में कोई हो या न हो. यही वजह है कि इस संस्था ने अब तक सैकड़ों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है. आशीष चटकले बताते है कि इनके काम में कोई शुल्क नहीं लिया जाता. बल्कि, संस्था के सदस्य खुद अपनी जेब से लकड़ियां, कपड़ा और अन्य सामग्री खरीदते हैं. कई बार स्थानीय लोग भी मदद के लिए आगे आते हैं. कुछ लोग अनाज, कुछ पैसे या कभी सिर्फ दुआओं के रूप में सहयोग करते हैं.

सुनील जैन समाज सेवी खाते है कि खंडवा की यह संस्था अब पूरे निमाड़ क्षेत्र के लिए मिसाल बन चुकी है. कई युवा इनके काम से प्रेरित होकर स्वयंसेवक बन चुके हैं. उनका मानना है कि समाज में अगर ऐसे लोग बढ़ें, तो कोई भी व्यक्ति ‘अकेला मरने’ की चिंता नहीं करेगा.



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