स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती ने उद्बोधन दिया।
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग द्वारा 84वीं शंकर व्याख्यानमाला का ऑनलाइन प्रसारण रविवार को एकात्म धाम के यू ट्यूब चैनल पर संपन्न हुआ। इस अवसर पर आर्ष विद्या मंदिर इंदौर के स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती ने “समत्वं योग उच्यते” विषय पर
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उन्होंने कहा कि मनुष्य इच्छाओं की पूर्ति के लिए पूरे जीवन भर काम्य कर्म में ही लगा रहता है, काम्य कर्म की अधिकता से राग, द्वेष उत्पन्न होते है, जो आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होते हैं। किसी भी साधक की आध्यात्मिक उन्नति के लिए अंत:करण का निर्मल एवं शुद्ध होना आवश्यक है । जीवन में हम सदैव प्रसन्नता, शांति, संतोष एवं मोक्ष चाहते हैं तो हमें नैमित्तिक कर्मों का पालन अवश्य करना चाहिए।
कर्म को कर्म योग में बदलने का विचार ही हमें कर्मयोगी बनाता है, जिससे जीवन में सभी लक्ष्य अवश्य प्राप्त होते है, यही समत्व दृष्टि है।
“समत्व” जीवन की सर्वोच्च साधना है यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में भी समान दृष्टि रखता है। उन्होंने बताया कि योग केवल आसन या प्राणायाम तक सीमित नहीं, बल्कि यह मन की वह अवस्था है जिसमें स्थिरता और संतुलन बना रहता है।
कार्यक्रम का समापन श्रोताओं के प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ। बड़ी संख्या में देश-विदेश से श्रोताओं ने ऑनलाइन सहभागिता की।