सतना जिले में कुपोषण की स्थित चिंताजनक है। 20 अक्टूबर को जिला अस्पताल में गंभीर हालत में लाए गए 4 माह के अति कुपोषित हुसैन रजा की मौत के मामले में स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले की लापरवाही सामने आई है। जन्म के कुछ ही महीनों बाद बार-बार बीमार पड़े हु
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दैनिक भास्कर की टीम ने मरवा गांव जा कर हुसैन रजा के परिजनों और BMO से बात कर यह जानने का प्रयास किया कि आखिर 4 माह के मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन है?
जन्म के कुछ ही महीनों बाद बार-बार बीमार पड़े हुसैन की
जन्म के चार महीने बाद हुई मौत
जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर मझगवां ब्लॉक के नयागांव पंचायत का छोटा-सा गांव है मरवा। यहीं के आमिर खान और आसमा बानो ने 3 जुलाई 2025 को जैतवारा के सरकारी अस्पताल में बेटे हुसैन रजा को जन्म दिया था। जन्म के समय उसका वजन 3 किलो था, जो की एक स्वस्थ बच्चे का संकेत है। लेकिन महज चार महीनों में ही यह मासूम 2.5 किलो तक सिमट गया और उसकी मौत तक हो गई।

जन्म के समय बच्चे का वजन 3 किलो था, जो बाद में 2.5 किलो तक सिमट गया।
कई अस्पतालों में इलाज कराया
दैनिक भास्कर से बातचीत में परिजनों ने बताया कि जन्म के बाद 10 दिन में ही हुसैन बीमार पड़ा। परिजन पहले जैतवारा, फिर जिला अस्पताल, उसके बाद आयुष्मान और निजी अस्पतालों में इलाज कराते रहे।
निमोनिया ने उसके शरीर को बार-बार तोड़ा। आखिर 18 अक्टूबर को हालत बेहद बिगड़ी तो उसे फिर जिला अस्पताल लाया गया। पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती किया गया, लेकिन दो दिन बाद 20 अक्टूबर को हुसैन की मौत हो गई।

पड़ताल में सामने आई लापरवाही
मामला सामने आने के बाद स्वास्थ विभाग ने जांच दज बनाया। सरदार वल्लभ भाई पटेल जिला अस्पताल में बच्चे का इलाज करने वाले डॉक्टरों और मझगवां ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. रूपेश सोनी ने अपनी रिपोर्ट सीएमएचओ डॉ. एलके तिवारी को सौंप दी।
रिपोर्ट में आशा कार्यकर्ता सोनू गर्ग और प्रियंका श्रीवास्तव को दोषी पाया गया, जिनकी मॉनिटरिंग और फॉलोअप में गंभीर चूक रही। जानकारी के अनुसार हुसैन रजा बार-बार निमोनिया का शिकार हुआ। जन्म के समय स्वस्थ वजन (3 किलो) होने के बावजूद लगातार बीमार होने से बच्चा अति गंभीर कुपोषण में चला गया।

बच्चे को पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती किया गया, लेकिन दो दिन बाद हुसैन की मौत हो गई।
टीकाकरण और पोषण सेवाओं में भी अनदेखी
हुसैन रजा को जन्म के समय ओपीवी, हेपेटाइटिस और बीसीजी के बर्थ डोज ही लगे। बाद में पेंटावेलेंट, रोटा और आईपीवी की वैक्सीन नहीं दी गई। मातृ वंदना योजना और सुरक्षित मातृत्व अभियान की सेवाएं भी नहीं मिल पाईं।
परिजनों ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उन्हें आंगनवाड़ी केंद्र से पोषण आहार नहीं मिला और आशा कार्यकर्ता कभी घर नहीं आई। जननी सुरक्षा योजना की राशि मिली, लेकिन मातृ वंदना की राशि अब तक नहीं दी गई।

दस्तक अभियान में भी नहीं हुआ चिह्नित
बता दें कि, स्वास्थ्य विभाग का दस्तक अभियान 22 अगस्त से 16 सितंबर तक चला था। इसका मकसद 0 से 5 वर्ष तक के कुपोषित बच्चों को चिह्नित करना था, लेकिन हुसैन रजा इस सूची में शामिल ही नहीं हुआ। यानी न तो निगरानी हुई, न कोई उपचार।
जानकारी के अनुसार यह वही अमला है जिसके भरोसे सरकार “संपूर्ण पोषण मिशन” चलाने का दावा करती है।
ऐसे बनाई थी मनगढ़ंत कहानी
आसमा बानो जब गर्भवती थी, तब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सकुन गौतम ने उसका नाम गर्भावस्था और टीकाकरण पंजी में दर्ज किया मगर अति गंभीर कुपोषित हुसैन रजा का पंजीयन नहीं किया गया। इस मामले में शकुन गौतम ने जवाब दिया था कि हुसैन रजा की मां उस वक्त गांव से बाहर थी जिस कारण सेवाएं नहीं दी गईं।
23 अक्टूबर को सीडीपीओ और पर्यवेक्षक के संयुक्त भ्रमण में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का झूठ पकड़ा गया। जांच टीम को बताया गया कि आसमा बानो और उसका बेटा गांव में ही रहते थे, केवल बच्चे को बीमार होने पर ही सतना ले जाया गया था। बच्चे को न तो एनआरसी में एडमिट कराया गया और न ही उसका अति गंभीर कुपोषित में पंजीयन किया गया।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने गृह भेंट भी नहीं किया। इन्हीं आरोपों के चलते परियोजना चित्रकूट क्रमांक-2 की डीपीओ रीता द्विवेदी ने एसडीएम महिपाल सिंह के अनुमोदन के बाद मरवा गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शकुन गौतम की सेवाएं समाप्त कर दीं। आशा कार्यकर्ता उर्मिला सतनामी और प्रियंका श्रीवास्तव को कार्य से पृथक किया गया। संबंधित 3 कर्मचारियों का इंक्रीमेंट रोका गया और अन्य 4 को शोकॉज नोटिस जारी किए गए।

बच्चे की मौत के बाद से मां समेत अन्य परिजन सदमें में है। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही के आरोप लगाए है।
विभाग ने एक-दूसरे पर डाली जिम्मेदारी
बच्चे की मौत के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आए। विभाग की ओर से दावा किया गया कि परिवार मरवा गांव में मौजूद नहीं था, बल्कि प्रयागराज या पुणे चला गया था।
इस दावे के समर्थन में ग्रामीणों से पंचनामा बनवाकर अंगूठे तक लगवा लिए गए। लेकिन बाद में ग्रामीणों ने बताया कि हमसे कोरे कागज पर अंगूठा लगवाया गया था। परिजनों ने बताया कि हम मरवा गांव में ही थे। सिर्फ झाड़-फूंक के लिए बच्चे को दो दिन प्रयागराज ले गए थे। विभाग अब बचाव में झूठे बयान दे रहा है।
सीडीपीओ और सुपरवाइजर को नोटिस
महिला एवं बाल विकास विभाग ने डीपीओ राजीव सिंह के निर्देश पर परियोजना अधिकारी रीता द्विवेदी और सेक्टर सुपरवाइजर किशनलाल प्रजापति को शोकॉज नोटिस जारी किया। डीपीओ ने पूछा कि बच्चे की मृत्यु किन कारणों से हुई, क्या बच्चे एवं परिजनों को विभाग की योजनाओं तथा सेवाओं का लाभ नहीं दिया गया। दोनों अधिकारियों को जवाब देने के लिए दो दिनों की मोहलत दी गई है।

पोषण पुनर्वास केंद्र में बच्चों को इस मेन्यू के अनुसार भोजन दिया जाता है।
जिले में 6 माह में 1200 से ज्यादा बच्चे भर्ती
जानकारी के अनुसार, सतना और नवगठित मैहर जिले के 9 पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच 1209 कुपोषित बच्चे भर्ती किए गए हैं। यानी हर माह औसतन 200 से ज्यादा बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे हैं। जिले में कुल 7935 कुपोषित बच्चे हैं, जिनमें 1451 गंभीर श्रेणी में हैं। संसाधन सीमित हैं, स्टाफ की कमी है, और निगरानी नाममात्र की।
अशिक्षा और गरीबी से जूझते परिवार
जिले के दूसरे ब्लॉक में भी यही स्थिति
दैनिक भास्कर की टीम जब मझगवां ब्लॉक के दूसरे गांव कानपुर पहुंची, तो वहां भी कुपोषण की त्रासदी सामने आई। कन्याकुमारी मवासी का एक साल का बेटा अभिराम एनआरसी में भर्ती कराया गया था, लेकिन मां उसे बीच में लेकर मजदूरी के लिए चित्रकूट चली गई। जब स्वास्थ्यकर्मियों ने दोबारा लाने को कहा, तो उसने इनकार कर दिया।

जिले में हर माह औसतन 200 से ज्यादा बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे हैं।
बीएमओ डॉ. सोनी ने बताया-

6.5 प्रतिशत से ज्यादा नही मिलने चाहिए कुपोषित बच्चे
सतना में आंगनवाड़ी केंद्रों में कुपोषण की स्थिति गंभीर है। नियमों के अनुसार किसी भी केंद्र में कुपोषित बच्चों की दर 6.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए, लेकिन जिले के कई केंद्रों में यह आंकड़ा 36 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
नागौद परियोजना के पनास आंगनवाड़ी केंद्र में 19 बच्चों की जांच में 7 बच्चे अति गंभीर कुपोषण की श्रेणी में पाए गए, यानी एक ही केंद्र में 36 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं। यह समस्या सिर्फ एक केंद्र तक सीमित नहीं है।

जिले की लगभग 125 आंगनवाड़ी केंद्रों में कुपोषण की दर शासन द्वारा तय सीमा से कहीं अधिक है, जो महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा खर्च किए जा रहे भारी-भरकम बजट के बावजूद जमीनी हकीकत की चिंता बढ़ाती है।
डिप्टी सीएम ने ली जानकारी, मास्टर प्लान की तैयारी
प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने पूरे मामले की जानकारी ली। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा-

