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Sagar News: कभी साइकिल से घूमकर एक-दो रुपये में अगरबत्ती बेचने वाले अंशुल सुहाने अब अपनी फैक्ट्री में 30 लोगों को रोजगार से जोड़े हुए हैं. 300 रुपये से तीन करोड़ रुपये तक का सफर हरगिज आसान नहीं था. अथक मेहनत, कड़ा संघर्ष और तमाम चुनौतियां मिलीं, जिसको अंशुल ने बड़े ही संयम और धैर्य के साथ पार किया.
सागर. ‘कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.’ यह लाइन मध्य प्रदेश के सागर के अंशुल सुहाने पर एकदम सटीक बैठती है क्योंकि 20 साल पहले उन्होंने महज 300 रुपये की लागत से अगरबत्ती के जिस बिजनेस को शुरू किया था, आज उसका टर्नओवर तीन करोड़ रुपये हो गया है. अंशुल अपनी पूनम अगरबत्ती फैक्ट्री से 200 वैरायटी की पूजन सामग्री तैयार करते हैं और इसकी सप्लाई देश के 15 राज्यों में हो रही है या यू कहें कि अगरबत्ती के रूप में एमपी का सागर देशभर में नई पहचान बना रहा है.
सागर के बाईसा मुहाल निवासी अंशुल सुहाने ने लोकल 18 से कहा कि यह काम तो उनके यहां तीन पीढ़ी से होता रहा क्योंकि एक अगरबत्ती फैक्ट्री में उनके दादा मुनीम थे. पिताजी वहीं अगरबत्ती फैक्ट्री में सेल्समैन थे, तो हम उनको देखते आ रहे थे कि उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती थी. ऐसे में हमने सोचा जो काम दूसरों के लिए करते हैं, वह अगर खुद के लिए किया जाए, तो मुनाफा बढ़ सकता है. यह सोचकर हमने बिजनेस शुरू कर लिया. ₹300 का कच्चा माल लेकर घर पर अगरबत्ती बनाई और फिर बेचने के लिए निकल पड़े. रोजाना 20 से 25 किलोमीटर दूर तक साइकिल से सफर तय करते थे. दुकानदारों के पास पहुंचते थे लेकिन लोकल की अगरबत्ती होने की वजह से कोई खरीदता नहीं था. उस समय बंगाल और बेंगलुरु की अगरबत्ती का सागर में खूब बोलबाला था, इसलिए हमारी अगरबत्ती को लोग इग्नोर कर देते थे.
अच्छी क्वालिटी से मिली पहचान
तब अगरबत्ती नहीं बिकने पर कभी-कभी हम बाजारों में चटाई बिछाकर रोड किनारे अगरबत्ती रखते थे और फुटकर में 50 पैसा, एक रुपये और दो रुपये में बेचते थे लेकिन धीरे-धीरे अच्छी क्वालिटी होने की वजह से हमारी अगरबत्ती पहचान बनाने लगी और फिर हमने अपनी छोटी बहन पूनम के नाम पर रजिस्ट्रेशन करवाया और फैक्ट्री शुरू की. अब यह पूनम अगरबत्ती के नाम से पूरे देश में पहचानी जाती है. हम जो भी पूजन सामग्री, अगरबत्ती आदि से जुड़ा काम करते हैं, उसमें 90 फीसदी महिलाओं को ही प्राथमिकता देते हैं ताकि महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल सके. अंशुल के काम में उनके पिता वीरेंद्र सुहाने और पत्नी भी हाथ बंटाती हैं.
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.