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विंध्य क्षेत्र में किसानों के बीच अब औषधीय खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है. रबी सीजन में किसान पारंपरिक फसलों के साथ चंद्रसूर, इसबगोल, गिलोय, सतावर और अश्वगंधा जैसी औषधीय फसलें उगाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं. ये फसलें न केवल बाजार में महंगे दाम देती हैं बल्कि भूमि की उपज क्षमता भी बढ़ाती हैं.
रबी का मौसम सिर्फ गेहूं और चने तक सीमित नहीं है बल्कि यह औषधीय पौधों की खेती के लिए भी बेहद अनुकूल समय है. इस सीजन में किसान चंद्रसूर और इसबगोल जैसी औषधीय फसलों को बोकर अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं. विंध्य क्षेत्र में अब कई किसान इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किसानों को औषधीय पौधे उगाने के लिए अलग खेत की जरूरत नहीं होती. इन्हें पारंपरिक फसलों के साथ मिलाकर बोया जा सकता है. इससे खेत की उत्पादकता बढ़ती है और किसानों को एक साथ दोहरा लाभ मिलता है. यह तरीका खेत और मेहनत दोनों का बेहतर तालमेल सुनिश्चित करता है.

सहायक संचालक उद्यानिकी अनिल सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि चंद्रसूर की खेती के लिए तो किसी विशेष तकनीक की जरूरत भी नहीं पड़ती. इसे सरसों की तरह ही बोया जा सकता है. एक एकड़ खेत में सिर्फ दो किलो बीज की जरूरत होती है.

किसानों को हमेशा बढ़िया क्वालिटी वाले बीज का चुनाव करना चाहिए. सही बीज का चयन फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों को बढ़ाता है. साथ ही साथ औषधीय पौधों का भी लाभ भी प्राप्त होता है.

इसबगोल की खेती के लिए नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसके पौधे गेहूं की तरह दिखते हैं और इन पर छोटी बालियां लगती हैं, जिनसे बीज प्राप्त होते हैं. इसबगोल के बीज औषधीय दृष्टि से बेहद फायदेमंद माने जाते हैं.

किसान एचएफ-5 किस्म के इसबगोल की खेती कर सकते हैं. एक एकड़ में लगभग दो किलो बीज पर्याप्त होता है. औसतन 4 से 6 क्विंटल बीज और एक से 1.25 क्विंटल तक भूसी प्राप्त होती है, जो औषधियों में इस्तेमाल होती है. इसकी मार्केट में काफी मांग है.

एलोवेरा, गिलोय और सतावर जैसे पौधों को किसान मुख्य फसल के साथ मिला सकते हैं. उदाहरण के तौर पर एलोवेरा को बाग में, गिलोय को खेत की मेड़ पर और सतावर को किनारों पर लगाया जा सकता है. इससे खेत की सुरक्षा के साथ-साथ आय में भी वृद्धि होती है.

औषधीय पौधों की खेती न केवल अतिरिक्त आय का साधन बनती है बल्कि यह टिकाऊ खेती की दिशा में एक मजबूत कदम भी है. कम लागत, सीमित संसाधन और बढ़ती मार्केट डिमांड के चलते अब किसान औषधीय खेती को नए अवसर के रूप में देख रहे हैं.