Balaghat News: केंद्र सरकार के नक्सलवाद को मार्च 2026 तक खत्म करने की डेडलाइन तय करने के बाद नक्सल प्रभावित राज्यों में ऑपरेशन तेज हो गए है. इसके लिए पुलिस साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपना रही है. छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में नक्सलियों की टॉप लीडरशिप के सरेंडर करने के बाद मध्य प्रदेश में भी सवाल उठ रहे हैं कि यहां के नक्सली सरेंडर क्यों नहीं करते हैं, लेकिन अब पुलिस प्रशासन ने भी अनोखी पहल शुरू की है. यहां पर छत्तीसगढ़ में सरेंडर कर चुके टॉप नक्सलियों के पोस्टर गांव-गांव में लगवाएं जा रहे हैं, ताकि सक्रिय नक्सली समझें कि हथियार छोड़ना ही समझदारी है.
बालाघाट में अनोखी पहल
बालाघाट 90 के दशक से नक्सली हिंसा की आग में झुलस रहा है. इन तीन दशकों में सुरक्षा बलों ने बड़ी कामयाबियां हासिल कीं, लेकिन मुखबिरी के शक में सैकड़ों ग्रामीणों की जान भी गई. अब वक्त है इस हिंसा की जड़ों को खत्म करने का और पुलिस भी इसके लिए लगातार नई रणनीतियां अपना रही है. प्रभावित गांवों में समस्या निवारण शिविर, रोजगार के अवसर, और सामाजिक संवाद जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. लोगों से अपील की जा रही है कि वे माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने की समझाइश दें.
पहल का असर भी दिखा
सुत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बालाघाट में पितकोना चौकी में देर रात एक महिला नक्सली ने सरेंडर किया है. वह बस्तर की रहने वाली है. वह साल 2022 से बालाघाट में सक्रिय है.
छत्तीसगढ़ में सरेंडर कर रहे नक्सली
हाल ही में पुलिस ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आत्मसमर्पण कर चुके सुझाता उर्फ कोपुरा, रूपेश उर्फ वासुदेव राय और भूपति जैसे टॉप माओवादी नेताओं की तस्वीरों वाले फ्लैक्स बालाघाट के नक्सल प्रभावित गांवों में लगवाए हैं. इन पोस्टरों में छग के 2100 से ज्यादा माओवादियों के मुख्यधारा में लौटने का जिक्र किया गया है.
पुलिस का मानना है कि जब नक्सल आंदोलन के बड़े चेहरे ही हथियार छोड़ चुके हैं, तो बालाघाट में सक्रिय नक्सलियों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए. हालांकि, यह पहल कितनी असरदार साबित होगी यह वक्त ही बताएगा. फिलहाल इतना तय है कि बालाघाट पुलिस का यह कदम माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में नई सोच और नई रणनीति का संकेत देता है. पुलिस अधीक्षक का कहना है कि हमारा उद्देश्य हिंसा का रास्ता छोड़कर माओवादियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है. हम छत्तीसगढ़ मॉडल को प्रेरणा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोग पुनर्वास नीति का लाभ उठा सकें.
बालाघाट के जंगलों में शरण लेते हैं नक्सली
आईजी संजय सिंह ने बताया कि छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में पुलिस दबाव बढ़ने पर नक्सली मध्य प्रदेश के बालाघाट के जंगलों में शरण लेते हैं. ये इलाका कान्हा नेशनल पार्क और लांजी के जंगलों से जुड़ा हुआ है. ऐसे में पर यहां छिपना आसान होता है.
बालाघाट में अब 3 नक्सली दलम सक्रिय
पहले बालाघाट में 6 नक्सली दलम (ग्रुप) सक्रिय थे, लेकिन लगातार पुलिस एक्शन के कारण अब सिर्फ 4 दलम बचे हैं. इनमें दर्रेकसा दलम, मलाजखंड दलम और खटिया मोचा दलम शामिल हैं. हर दलम में करीब 20 सदस्य होते हैं और वे एक खास इलाके में ही सक्रिय रहते हैं.
सरेंडर से ज्यादा मारे जा रहे नक्सली
पिछले कुछ सालों में मध्य प्रदेश सरकार ने सरेंडर पॉलिसी बनाई, लेकिन ज्यादातर नक्सली दूसरे राज्यों के होते हैं. इसलिए वे अपने राज्यों में सरेंडर करते हैं. पिछले 5 सालों में 24 से ज्यादा नक्सली एनकाउंटर में मारे गए हैं. ऐसे में ये दिखाता है कि पुलिस लगातार दबाव बनाए हुए है. यह एनकाउंटर पुलिस के लिए बड़ी सफलता है, लेकिन बाकी बचे नक्सलियों की तलाश जारी है.